मंगलवार, दिसंबर 21, 2021

खुद के प्रकाश से चमकना है तुझे

चांद नहीं, सूरज बनना है तुझे|
दूसरों के प्रकाश से नहीं 
खुद की रोशनी से चमकना है तुझे |
लम्बी लताओं-सी परपोषी नहीं, 
दूब-सा स्वपोषी बनना है तुझे|

हजार बार पैरों तले 
कुचलने जाने पर भी
दूब-सा सीना तान उठना है तुझे|
पुनः मस्त मगन हो कर लहराना है तुझे |
शाम - सा ढलकर 
फिर सुबह के सूरज सा चमकना है तुझे|

दूसरों पर निर्भर नहीं 
आत्मनिर्भर बनना है तुझे|
खुद पर उठने वाली उंगलियों को 
ताली वाले हाथ में बदलना है तुझे|
कीचड़ में रहकर भी 
कमल सा खिलना है तुझे|

फूल बनकर भी 
आत्मरक्षा के खातिर
शूल रखना है तुझे|
दूसरों से प्यार करने से पहले 
खुद से प्यार करना है तुझे|
खुद का हाथ खुद ही पकड़कर चलना है तुझे|

गैरों से दोस्ती करने से पहले 
खुद से दोस्ती करना है तुझे|
उदाहरण देना नहीं
बल्कि खुद का उदाहरण 
पेश करना है तुझे|
पद चिन्हों पर चलना नहीं 
खुद के पदचिन्ह छोड़ना है तुझे |


रविवार, दिसंबर 12, 2021

अमीरी गरीबी के बीच की गहरी होती खाई

जैसा कि पिछले साल ही एक संस्था द्वारा यह बात सामने आई थी कि कोरोना काल में दुनिया भर में गरीबी और अमीरी के बीच की खाई बहुत ही गहरी हो चुकी है! जो गरीब था वह और भी गरीब हो गया और जो अमीर था वह और भी अमीर हो गया! करोना काल के चलते! जोकि अत्यंत घातक है! वहीं इस साल की विश्व असमानता रिपोर्ट 2022 के आंकड़े भारत को झकझोर देने वाले हैं! विश्व असमानता लैब के मुताबिक भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जो दुनिया के सबसे अधिक असमानता लिए हुए हैं! इस रिपोर्ट के अनुसार भारत की 10% आबादी 57% नेशनल इनकम अपने पास रखे हुए है! यानी कि अगर जनसंख्या 50 करोड़ है तो मात्र 15 करोड़ लोग ही देश का 57% इनकम अपने पास रखते हैं! और वहीं दूसरी तरफ 50%आबादी के पास सिर्फ 10% के आसपास का धन ही है! रिपोर्ट के अनुसार भारत की 1% जनसंख्या 22% इनकम अपने पास रखती है! यानि कि 1/5 हिस्सा पूरी कमाई का 1% आबादी के पास है! वहीं बॉटम हॉफ के पास 13.1% हिस्सा है! इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में इकोनामिक रिफॉर्म और लिबरलाईजेशन जो हुआ उसके बाद में एक प्रतिशत लोगों को ही इसका सबसे अधिक फायदा हुआ! भारत में जो 1991 में लिबरलाइजेशन ,ग्लोबलाइजेशन और प्राइवेटाइजेशन लाए गए थे जिसके चलते बहुत अधिक तारीफ हुई थी तत्कालीन सरकार की उसके बारे में कहा गया है, कि केवल एक ही प्रतिशत लोगों को इससे फायदा हुआ ! यानी पैसे वाले को और पैसे वाला बना दिया गया और गरीब को और गरीब बना दिया गया!इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि क्या हालात है देश के अंदर !इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में जो वयस्क व्यक्ति (जनसंख्या के आधार पर) दो लाख चार हज़ार रुपये की कमाई करता है अगर वह एक एवरेज कमाई की बात करे तो! जबकि बॉटम 50% यानी 53 हजार रुपये कमाता है ,वही टॉप का जो 10 % है वह लगभग 20 गुना अधिक पैसे कमाता है! इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारे देश में कितनी असमानता आ चुकी है अमीरी और गरीबी के बीच की खाई कितनी गहरी हो चुकी है! जिसको भरना बहुत ही कठिन हो चुका है! यह दिखाता है कि किस ओर बढ़ रहे हैं हम,यह बहुत ही चिंताजनक है! इस खाई को भरनेेे के लिए भारत सरकार को बहुत ही जरूरी और कठोर कदम उठाने होंगे, नहीं तो यह स्थिति बहुत ही विकराल और घातक रूप धारण कर लेगी और फिर इसे बदल पाना बहुत ही मुश्किल हो जाएगा ! इस कारण से लोग उस साम्यवाद का मांग करेंगे जो वर्षों पहले चीन में हुआ था ! जिसमें अमीर लोगों से उनकी संपत्ति छीन कर गरीब लोगों में बांट दी गई थी और उनकी हत्या कर दी जाती थी, जो संपत्ति देने से इनकार करते थे! जिसमें अनेक निर्दोष लोगों की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई थी कि वे अमीर थेें! जैसा कि भारत में वर्तमान में कुछ पार्टियां हैं! जो माओवादी विचारधारा की राहों पर चल रही है !और नक्सलवादी विचारधारा को भी पूर्णतः खत्म नही किया जा सका है!  जबकि बहुत से नक्सलियों को खत्म करने की बात सामने आती रहती है, पर हमें  हमारे नायक भगत सिंह की  यह बात नहीं भूलनी चाहिए -" लोगों को मारकर उनके विचारों को नहीं मारा जा सकता!" ये बात हर  विचारधारा (अच्छी और बुरी) के लिए लागू होती है इसलिए नक्सलियों को मारने से अधिक जरूर है नक्सलवादी विचारधारा को मारना!और अगर ऐसे ही गरीबी और अमीरी के बीच की खाईं बढ़ती रही तो साम्यवादी विचारधारा के नये नये और खतरनाक रूप सामने आ सकतें हैं! जैसे साम्यवादी विचारधारा ने माओवादी और नक्सलवादी आदि खतरनाक विचारधारा का रूप लिया था! इसलिए ऐसी कोई स्थिति आनेेे से पहले जरूरी कदम उठाने की सख्त जरूरत है !  

सोमवार, दिसंबर 06, 2021

नि:शब्द


उस बस्ती में रोज की तरह आज भी चूल्हे से उठता धुआं बगल में लगे कूड़े के डेर से उठती असहनीय बदबू वहीं पास में खेल रहे बच्चे और बगल में बह रहा गंदा नाला बस्ती से सटी गगनचुंबी बिल्डिंग्स जिसमें हजारों लोग रहते हैं जिसमें जाने के लिए चमचमाती सड़कें हैं, जिस पर अनेकों लोग आ जा रहे हैं! पर एकदम शांति है सिर्फ मोटर कार की आवाज ही आ रही है और वहीं बस्ती में शाम के वक्त कुछ ज्यादा ही चहल पहल है भेड़, बकरियों की आवाज बच्चे के रोने की आवाज आदि आ रही है! बस्ती में जाने के लिए कच्ची सड़कें हैं जिस पर शाम के वक्त कुछ ज्यादा ही धूल उड़ रही है! यह दृश्य अमीर और गरीब के बीच की असमानता को साफ साफ दर्शाता है ! अमीर और गरीब के बीच की खाई दूर से ही देखकर महसूस की जा सकती है! कच्ची सड़कों पर कुछ बच्चे एक साथ कूड़े से मिले जरूरी सामान को बोरी में भरकर पीठ पर लादे आपस में जोड़ घटाव करते हुए आ रहें हैं, कुछ खुश तो कुछ उदास दिख रहें हैं ! तभी बगल से एक लंबी सी चमचमाती कार, धूल उड़ाते हुए सामने निकलती है कार को देखकर सभी बच्चे कार के पीछे दौड़ पड़े यह सोच कर कि कोई सोशल वर्कर उनके लिए कुछ लेकर आया है! कार बस्ती के बीचो बीच जाकर रुकी, कार के रुकते ही आसपास के सभी बच्चे कार को घेर कर खड़े हो गए तभी कार का दरवाजा खुला, जिसमें से घुंघराले बालों, अच्छी कद काठी वाला व्यक्ति निकला। जिसकी उम्र लगभग 50-55 की होगी। उसके हाथ में एक मोटी सी डायरी और कलम है , और आंखों पर गोल फ्रेम का ऐनक पहन रखा है। यह व्यक्ति एक मशहूर लेखक है, पर बच्चों के लिए अजनबी। सभी बच्चे बड़ी उत्सुकता से उसकी तरफ देख रहे हैं लेखक बच्चों की तरफ देखता है और उनके पास जाता है खड़े-खड़े ही उनसे कुछ देर बात करता है और अपनी डायरी में कुछ लिखता है! फिर पास की झोपड़ी में चूल्हे पर खाना पका रही महिला के पास जाता है और लेखक वही बगल में पड़ी खाट पर बैठते हुए कहता है कि 'चूल्हे के धुए से आपको बहुत तकलीफ होती होगी ,मैं समझ सकता हूं'  सभी बच्चे लेखक को घेर कर खड़े हो जाते हैं! लेखक वहीं बैठे वृद्ध व्यक्ति से बातें करने लगता है और अपने बारे में बताता है उन्हें बताता है कि वह उनकी गरीबी पर एक किताब लिखने के लिए आया है! इतना सुनकर वृद्ध व्यक्ति के लबों पर एक अजीब सी मुस्कान तैर जाती है! वृद्ध व्यक्ति मुसकुराते हुए कहता है आपसे पहले भी बहुत लोग आ चुके हैं हमारी गरीबी को कोरे कागज़ पर उतारने के लिए..! खैर, आपकी किताब के लिए जितनी मदद कर सकता हूँ वो करूँगा! लेखक साहब बातें करते करते अपनी डायरी पर कुछ पॉइंट लिख भी रहे हैं! तभी एक 15-16 साल का दुबला पतला सा लड़का बच्चों के बीच से बाहर आकर लेखक सेे बोलता है अंकल क्या मैं कुछ पूछ सकता हूं? लेखक कहता है हाँ, हाँ क्यों नहीं बिल्कुल!मैं आप लोगों से बातें करने और आप लोगों के बारे में जानने ही तो आया हूं ,बेझिझक पूछो जो पूछना है! 
अंकल हमारी बेबसी को कैमरे में कैद करके बहुतों की जिंदगी चमक जाती है तो फिर हमारी जिंदगी बेरंग ही क्यों रहती है? जब लोग हमारी गरीबी को मात्र कोरे कागज  पर उतार कर अमीर और फेमस हो जाते हैं तो हम गरीब क्यों रह जातें हैं? मतलब जिसकी वजह से बहुत से लोग अमीर हो जाते हैं वो गरीब क्यों रहता है? यह सवाल सुनकर लेखक निशब्द हो जाता है और उसकी कलम वहीं की वहीं रुक जाती है.....! मानो उसके शब्दकोश में शब्द ही नहीं रह गए! 

गुरुवार, दिसंबर 02, 2021

सबसे बड़ी सज़ा

अरू आज शॉपिंग से वापस आने के बाद पहले जैसे खुश नहीं थी और ना ही उछलते हुए सभी को अपने कपड़े,सैंडल आदि दिखाने गई! आते ही उसने कमरे में पड़ी टेबल पर शॉपिंग के बैग को रख दिया और कमरे में पड़ी बेड पर तकिए में मुंह छुपा कर लेट गई! तभी वहां उसका भाई नील आया और बोला 'ओए! तुझे क्या हुआ? तू ऐसे लेटी क्यों है? कपड़े नहीं दिखाने सभी  को? ' अरू बोली 'नहीं कुछ नहीं ,बस थक गई हूं मूड नहीं है! इस पर नील अरू को चिढ़ाते हुए बोला अच्छा ! इससे पहले तो कभी नहीं थकती थी! शॉपिंग जाने से पहले तो ऐसे ही चहक रही थी जैसे पहली बार फ्लाइट में बैठने जा रही है! और अब जब सारी शॉपिंग हो गई फिर मुंह क्यों लटका है?'नहीं भाई कुछ नहीं हुआ है! पर तू मेरे रूम में बिना नॉक किए मत आया कर! और हां! जब मैं अकेली रहूं तो तुम मुझसे बात करने रूम में मत आया कर ,अगर कोई काम हो तो बाहर बुला लिया कर!' अरू का यह रूप देखकर नील एकदम हैरान था! उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या है? बोला अरू तू ऐसे क्यों बात कर रही है? मैं तेरा भाई हूं और वह भी सगा! शॉपिंग में कोई चीज की कमी रहेगी जो तू मुझ से नाराज है? देख कल तेरा बर्थडे है और मुझे तेरी यह शक्ल बिल्कुल भी पसंद नहीं मुझे  तेरी स्माइल देखनी है! 'हो गया तुम्हारा, तो अब जाओ यहाँ से! मुझे कुछ देर अच्छा महसूस कर लेने दे ! प्लीज! ये सुनकर नील बहुत दुखी होता है और उदास होकर वहां से चला जाता है! रात के 12:00 बजते ही नील अरु के रूम में बर्थडे विश करने आता है और जैसे ही बर्थडे विश करता है, अरू उस चिल्ला पड़ती है, तुम इतने असभ्य कैसे हो सकते हो ?रात के 12:00 बजे एक लड़की के रूम में.......! तुम ऐसी हरकत करने से पहले ये क्यों नहीं सोचते कि सामने वाला क्या महसूस कर रहा है वह तुम्हारे साथ सहज महसूस करता है या नहीं? यह सुनकर नील बोला पर तू तो रात में डरने पर मेरे पास आ जाती थी,क्योंकि तू मेरे पास खुद को सबसे अधिक सुरक्षित महसूस करती थी फिर ऐसा क्या हुआ जो तू ऐसी बातें कर रही है? तेरी सोच इतनी घटिया कैसे हो गई? छी...!मैं देख रहा हूं कल मार्केट से आने के बाद से तू मेरे साथ ऐसे विहैव कर रही है जैसे मैं तेरा भाई नहीं बल्कि कोई अजनबी हूँ! 'मेरी सोच घटिया नहीं बल्कि तुम घटिया इंसान हो !' और क्या कहा सुरक्षित महसूस करती थी मैं तुम्हारे साथ, हां करती थी पर कल मॉल में तेरा जो रूप देखा उसके बाद बिल्कुल भी सुरक्षित महसूस नहीं करती हूं! डर लगता है मुझे तेरे साथ! आश्चर्य से नील बोला! कौन -सा रूप?  अरू बोली 'तुम्हें सच में नहीं मालूम...? कल उस लड़की को गंदी नजर से देखने वाले तुम नहीं थे तुम्हारा भूत था क्या? इतना सुनते ही नील के चेहरे का रंग उड़ गया! अरू आगे बोलती है तुम गंदी नजर से उस लड़की को देख रहे थे पर तुम्हारी नजरें चुभ मुझे रही थी, असहज मैं महसूस कर रही थी, तुम्हारी नजरें निवस्त्र उस लड़की को कर रही थी पर निवस्त्र मैं भी हो रही थी! और तुम्हारा चरित्र भी मेरे सामने निवस्त्र हो रहा था! तुम मेरे रक्षक और बाकियों के लिए भक्षक क्यों हो? भाई ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि जितना सुरक्षित और सहज मैं तेरे साथ महसूस करती हूं उतना बाकी लड़कियां भी करें? अगर कोई लड़का दूसरी लड़कियों के लिए भक्षक ना बने तो उसे अपनी बहन का रक्षक बनने की जरूरत ही ना पड़े! मुझे हंसते हुए देखना चाहते हो, मुझे तोहफा देना चाहते हो ना ?तो तुम मुझे अपनी ये बुराइयां दे दो तोहफे में! मैं इस साल कैंडल नहीं बल्कि तुम्हारी इस बुराई को जलाना चाहती हूं! दे सकते हो...? अरू का नील के साथ असुरक्षित महसूस करना नील के लिए सबसे बड़ी सज़ा थी! नील पत्थर की मूरत सा खड़ा जमीन को देखे जा रहा था और उसकी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी! उसके आंसुओं के साथ उसकी बुराइयां भी बह रही थी! अपने आंसुओं से अपनी गुनाहों का  प्रायश्चित कर रहा था! 

शनिवार, नवंबर 27, 2021

ये कलम हर बार कमाल करती है!

जब आहत होती विश्व के क्रंदन से
तब ये कलम, 
कोरे कागज़ को रंगीन करती है! 
जब जब होता है 
अभिव्यक्ति की आज़ादी पर वार, 
तब तब कलम की तेज धार 
शब्द रूपी बड़ों से करती है प्रहार! 
जब मन में क्रोध का फूटता है अंगार, 
तब कलम की तेज धार से 
कोरे कागज पर 
शब्दों का उमड़ता है सैलाब! 
कभी दर्द तो कभी 
दिल के अरमान लिखती है 
कभी मधुर मुस्कान 
तो कभी अश्रुधार  लिखती है! 
जब मन में उमड़ता है
सवालों का तूफान 
तब ये कलम करती है जनसंचार! 
जब करता है कोई उपहास 
तब यह कलम बन तलवार का 
रूप धारण करती है! 
किए बिना रक्त रंजित घायल करती है! 
कभी प्रफुल्लित होकर 
कोरे कागज का मंत्रमुग्ध 
करने वाला श्रृंगार करती है ! 
कभी प्यार की बौछार करती है, 
तो कभी गुस्से का अंगार उगलती है
ये कलम हर बार कमाल करती है! 

शनिवार, नवंबर 20, 2021

क्यों नन्ही सी कली खिलने से पहले ही तोड़ दी जाती है?

क्यों हमारे सपने डायरी के पन्नों में 
ही सिमट कर रह जाते हैं ?
क्यों बाहर निकलने से घबराते हैं ?
यदि डायरी से बाहर आ भी जाते हैं 
तो एक ऊंची उड़ान भरने से पहले 
क्यों उनके पंख तोड़ दिए जाते हैं ?
सपनों की दुनिया 
क्यों एक डायरी में ही 
सिमट कर रह जाते हैं? 
क्यों हमारी ख्वाहिशों का 
खुली हवा में एक लंबी सांस भरने से 
पहले गला घोट दिया जाता है? 
हमारी आंखों में सुनहरे सपने 
पलने से पहले ही 
क्यों खौफनाक मंजर भर दिए जाता है ? 
क्यों हमें अपने सपने को 
सिर्फ डायरी तक ही सीमित 
रखने का अधिकार है ? 
क्यों हमारे विचारों को चारदीवारी में 
कैद करने का हर संभव प्रयास किया जाता है? 
क्यों हमारे अपनों द्वारा हमेशा 
यह नसीहत दी जाती है , 
कि घर के बाहर के मामले में 
दखल करना लड़कियों के संस्कार नहीं ? 
क्यों हमेशा हमें संस्कारी बनाने के 
नाम पर बेचारी बनाया जाता है? 
क्यों हमेशा हमें  सिर्फ सहना 
सिखाया जाता है? 
कुछ तो कर रहीं अंतरिक्ष में नाम दर्ज, 
तो कुछ निभा रहीं देश भक्ति का फर्ज! 
पर कुछ अभी कर रही चौखट के 
बाहर निकलने का ही संघर्ष! 
क्यों कुछ को चौखट के 
बाहर जाने का भी अधिकार नहीं? 
क्यों पुत्र मोह में अंधी मां द्वारा
नन्ही-सी कली खिलने से 
पहले ही तोड़ दी जाती है? 
क्यों कुछ इस दुनिया में 
आने के खातिर कर रहीं हैं संघर्ष? 

सोमवार, नवंबर 15, 2021

खेल-ए-जिंदगी

अचानक महसूस होता है 
कि मैं क्यों हूँ ? 
अचानक मरने की इच्छा, 
अचानक मरने का डर! 
अजीब-सी है मन में हलचल ! 
अचानक क्रोध,
अचानक हंसी का नाट्य, 
कभी लगता, हूँ बिमार, 
कभी अत्यंत कमजोर
तो कभी मजबूत चट्टान! 
अजीब से हैं हालात! 
कभी भीड़ में भी 
तन्हाई का एहसास 
और कभी अकेले में 
भी हजारों के साथ! 
सुख की निर्मम भोलेपन में 
छिप जाती दुख की गठरी, 
कभी जिंदगी पकड़ती रफ़्तार 
तो कभी लगती ठहरी! 
कभी जिंदगी सर्द की 
सुनहरी धूप-सी 
तो कभी लगती 
जेठ की तपती दोपहरी! 

               चित्र गूगल से साभार


नारी सशक्तिकरण के लिए पितृसत्तात्मक समाज का दोहरापन

एक तरफ तो पुरुष समाज महिलाओं के अधिकारों और उनके सम्मान की बात करता है और वहीं दूसरी तरफ उनके रास्ते में खुद ही एक जगह काम करता है। जब समाज ...