पहले पढ़ने का शौक था अब लिखने की बिमारी है।ये कलम कभी न रुकी थी, न ही आगे किसी के सामने झुकने और रुकने वाली है।क्योंकि कलम की जिंदगी में साँसें नहीं होतीं।कवयित्री तो नहीं हूँ पर अपनी भावनाओं को कविताओं के जरिए व्यक्त करती हूँ।लेखिका भी नहीं हूँ लेकिन निष्पक्ष लेखन के माध्यम से समाज को आईना दिखाने का दुस्साहस कर रही हूँ।
सोमवार, जनवरी 31, 2022
नेताओं का भी दर्द तो समझों कोई (व्यंग्य)
शनिवार, नवंबर 27, 2021
ये कलम हर बार कमाल करती है!
गुरुवार, अगस्त 05, 2021
मानवता की हदें पार करने वाले के लिए मानवता की बात क्यों?
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| तस्वीर गूगल से |
शनिवार, जुलाई 24, 2021
वो जिस्म बेचती है तो वो बाजारू कहलायी लेकिन जिस्म को खरीदने वाले.....?
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| गूगल से |
शुक्रवार, मई 28, 2021
अब इस अनोमल जिंदगी को यूँ ही नहीं गवाना
क्या कसूर है हमारा ?
क्यों कैद भरी जिंदगी जीने पर
मजबू़र कर रहा ये जमाना ?
बता दे हमे ऐ जमाना ?
क्या लड़कियाँ नहीं जीत सकती जंग ?
भूल गए क्या वो अतीत ?
झाँसी की मर्दानी की जीत !
कहाँ की है ये रीत ?
कि लड़कियों को रखो घरों में कैद,
किसने बनाई ये रीत ?
यदि तुम लोगों की यही है नीत,
तो अब तुम्हारी हार है नजदीक |
अब कान खोल कर सुन ले ऐ जमाना |
इन चार दिवारियों को,
तोड़ने का हमने है ठाना |
अब नहीं रोक सकता हमे ऐ जमाना |
अभी तक हमने तुम्हारा कहना माना ,
तुम्हारें हर जुर्म को सहना चाहा ,
पर अब इस अनोमल जिंदगी को
यूँ ही नहीं गवाना |
किसी भी लड़की की ख्वाहिशों को
नहीं दफना सकता ऐ जमाना!
सदियों से दबी है जो आवाज़ ,
उसे ज्वालामुखी के रुप मे है बाहर लाना |
अब इस जमाने को धूल है चटाना |
कलम को है अपनी ताकत बनाना |
जिंदगी जीने का
असली मकसद अब है जाना |
मंगलवार, मई 18, 2021
जब पानी सर से बह रहा, फिर कैसे मैं मौन रहूँ?
तुम कहते हो मैं मौन रहूँ,जब पानी सर से बह रहा,तो कैसे मैं चुप- चाप सहू?क्या डूबने का इंतज़ार करूँ?दम घुट रहा है अब मेरा,और तुम कहते हो थोड़ा धैर्य धरूं!क्या आखिरी सांस का इंतज़ार करूँ?जब पानी सर ....................व्यंग्यों के चुभते बाणों को,कैसे मैं दिन रात सहूँ?जो घायल करते मेरे हृदय को,उन पर कैसे ना पलटवार करूँ?हद से अधिक सहनशीलताकायरता कहलाती है!फिर कैसे मैं चुप- चाप रहूँ?वे करते हैं अस्त्र- शस्त्र से वार,मैं कलम से भी ना प्रहार करूँ?तुम्हें शोभा देता होगा चुप रहना,पर मेरे लिए धिक्कार है!जब पानी सर...........चीरहरण हो रहा द्रोपदी काकैसे मैं नज़रअंदाज़ करूँ?जी करता है उस हैवान के प्राण हरूँ,और तुम कहते हो,मैं जीना भी ना दुशवार करूँ!जो क्षमा के पात्र नहीं,उसकी दया यचिका,कैसे मैं स्वीकार करूँ?माफ़ी गलती की दी जाती है,गुनाहों को कैसे मैं माफ़ करूँ?जब पानी सर............
शनिवार, मार्च 06, 2021
कलयुगी रावण
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| आईना ना हमें दिखाओ, अपनी अश्लील नज़रों का जा कर शुद्धीकरण कराओ! |
अनगिनत चहरे छुपा के रखते हैं ये कलयुगी रावण
अश्लील अंदाज में राम का नाम लेकर
लड़कियों को छेड़ते हैं,
मर्यादा की सारी हदें पार करते हैं,
और खुद को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र का सच्चा भक्त बोलते हैं!
खुद करते हैं, काली करतूत
और महिलाओं को चेहरा ढकने पर करते हैं मजबूर!
खुद के घर की बेटियों के सिर से चुन्नी पल भर के लिए नहीं उतरने देते हैं,
और दूसरों की बहन और बेटियों को,
अपनी गंदी नजरों से निवस्त्र कर देते हैं!
लड़कियों को देख कर,
यौन का इन पर इस तरह चढ़ता है भूत
कि इनका खुद पर नहीं रहता नियंत्रण
और कर बैठते हैं काली करतूत!
है निवेदन,मेरी इनकी माँ और बहनों से
कि इनसे रहे हमेशा दूर!
क्या पता कब इन पर चढ़ जाये यौन का भूत,
और ये कर बैठे अपने ही लोगों के साथ काली करतू़त!
मत करो अपमान जानवरों का, इन लोगों की तुलना करके जानवरों से!
क्योंकि जानवर ,जानवर वाला ही कार्य करता है,
लेकिन ये मानव रूपी दानव..........?
नारी सशक्तिकरण के लिए पितृसत्तात्मक समाज का दोहरापन
एक तरफ तो पुरुष समाज महिलाओं के अधिकारों और उनके सम्मान की बात करता है और वहीं दूसरी तरफ उनके रास्ते में खुद ही एक जगह काम करता है। जब समाज ...
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आईना ना हमें दिखाओ, अपनी अश्लील नज़रों का जा कर शुद्धीकरण कराओ! खुद के घर की लड़कियों का सुरक्षा कवच बनते हैं और दूसरे के घर की लड़कियों क...
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एक तरफ तो पुरुष समाज महिलाओं के अधिकारों और उनके सम्मान की बात करता है और वहीं दूसरी तरफ उनके रास्ते में खुद ही एक जगह काम करता है। जब समाज ...
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उसके भी थे कुछ सपने! अभी वो खुद को भी ठीक से समझ नहीं सकी थी कि दूसरों को समझने की बारी आ गई खुद के पैरों पर खडी़ होती उससे पहले...




