बढ़ती उम्र के साथ
मेरी बैचेनी बड़ती जाती है|
मैं भी न हो जाऊ बाकियों सी
ठोड़ी निर्दयी व स्वार्थी ?
ये बात हरपल सताती है|
सब कहते हैं मुझ से,
बड़ी होकर तू भी
अपने कामों में व्यस्त हो जाएगी,
फिर तुझे भी भूखे बच्चों
और गरीबों की चिंता नहीं सतायेगी|
जब दबायी जाएगी तेरी आवाज़,
तो तू दूसरों के लिए आवाज उठाना भूल जाएगी|
सब कहते हैं मुझ से,
जिम्मेदारियों के बोझ तले
तेरी दरियादिली भी दब जाएगी|
जन्मदिवस मुझे खतरे की घंटी सा लगता है,
स्वार्थपन की तरफ बढ़ता कदम सा लगता है|
जन्मदिवस पर अपने मैं खुश न हो कर
ये सोच दुखी हो जाती हूँ कि,कहीं बड़ी होकर
मैं भी न अपनों में ही उलझ कर रह जाऊँ?
रिश्तों के बन्धन में बंधकर,
सबकी तरह मैं भी स्वार्थी न बन जाऊँ?
जाने दो, हमसे क्या मतलब'
कहीं इस महा भयानक मानसिक रोग
से मैं भी ग्रसित न हो जाऊँ?
जिस रोग से मनुष्य आधा मर जाता है,
कहीं मैं भी न मर जाऊँ?
सब कहते हैं मुझसे वक्त के साथ
सोच बदल जाती है|
अपने दुःख, दर्द के आगे दूसरों की
पीड़ा नजर नहीं आती है|
डर लगता है कहीं मैं अपने दर्द के आगे
दूसरों का दर्द न देख पाऊँ?
कोशिश तो मेरी है
अपने सिद्धान्तों पर चलने की,
लोगों की ऊलजलूल बातों को
गलत साबित करने की|
पर कहीं न कहीं मुझे
ये बात बहुत डराती है|
अगर ये सच है कि
उम्र बढ़ने पर लोगों की
सोच बदल जाती है?
उनके अन्दर की दरियादिली
ठोड़ी सी भी अगर मर जाती है,
तो काश कि मेरी उम्र यहीं रुक जाती,
या मेरी सोच छोटे बच्चे सी हो जाती,
और मैं स्वार्थी होने से बच जाती!