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शुक्रवार, फ़रवरी 04, 2022

बुराई से लड़ते लड़ते बुरे बन गयें हम

बुराई से लड़ते लड़ते 
लोगों की नज़र में 
बुरे बन गए हम।
ये सब देख 
सहम कर ठहर गए हम।
गलत धारणाओं को 
खत्म करने की चाह में
लोगों की नजरों में 
बुरा बनना भी 
कबूल कर गए हम।
गैरों से जीतने की 
तो दूर की बात
अपनो से ही 
मात खा गए हम! 
एक बार फिर अपनो को 
जीतने के खातिर
आपनो से हार गए हम।  
दर्द तो तब खूब हुआ
जब आपनो की नज़र
गलत हो गयें हम।
एक बार फिर टूट कर 
खामोश हो गए हम।
दूसरों को खुश रखने की 
चाह में अपने 
फड़कते होठों की 
मुस्कान गव़ा बैठे हम।
आपनो को पाने की चाह में
खुद को खोते चले गए हम।

- मेरी डायरी से (2020) 

शुक्रवार, दिसंबर 24, 2021

जिम्मेदारियों के बोझ तले कहीं दरियादिली न दब जाए

बढ़ती उम्र के साथ 
मेरी बैचेनी बड़ती जाती है|
मैं भी न हो जाऊ बाकियों सी 
ठोड़ी निर्दयी व स्वार्थी ? 
ये बात हरपल सताती है|
सब कहते हैं मुझ से, 
बड़ी होकर तू भी 
अपने कामों में व्यस्त हो जाएगी, 
फिर तुझे भी भूखे बच्चों 
और गरीबों की चिंता नहीं सतायेगी|
जब दबायी जाएगी तेरी आवाज़, 
तो तू दूसरों के लिए आवाज उठाना भूल जाएगी|
सब कहते हैं मुझ से,
जिम्मेदारियों के बोझ तले
तेरी दरियादिली भी दब जाएगी|
जन्मदिवस मुझे खतरे की घंटी सा लगता है, 
स्वार्थपन की तरफ बढ़ता कदम सा लगता है|
जन्मदिवस पर अपने मैं खुश न हो कर 
ये सोच दुखी हो जाती हूँ कि,कहीं बड़ी होकर 
मैं भी न अपनों में ही उलझ कर रह जाऊँ? 
रिश्तों के बन्धन में बंधकर, 
सबकी तरह मैं भी स्वार्थी न बन जाऊँ? 
जाने दो, हमसे क्या मतलब'  
कहीं इस महा भयानक मानसिक रोग 
से मैं भी ग्रसित न हो जाऊँ? 
जिस रोग से मनुष्य आधा मर जाता है, 
कहीं मैं भी न मर जाऊँ? 
सब कहते हैं मुझसे वक्त के साथ 
सोच बदल जाती है|
अपने दुःख, दर्द के आगे दूसरों की
पीड़ा नजर नहीं आती है|
डर लगता है कहीं मैं अपने दर्द के आगे 
दूसरों का दर्द न देख पाऊँ? 
कोशिश तो मेरी है 
अपने सिद्धान्तों पर चलने की, 
लोगों की ऊलजलूल बातों को 
गलत साबित करने की|
पर कहीं न कहीं मुझे 
ये बात बहुत डराती है|
अगर ये सच है कि 
उम्र बढ़ने पर लोगों की
सोच बदल जाती है? 
उनके अन्दर की दरियादिली 
ठोड़ी सी भी अगर मर जाती है, 
तो काश कि मेरी उम्र यहीं रुक जाती, 
या मेरी सोच छोटे बच्चे सी हो जाती,
और मैं स्वार्थी होने से बच जाती! 

सोमवार, नवंबर 15, 2021

खेल-ए-जिंदगी

अचानक महसूस होता है 
कि मैं क्यों हूँ ? 
अचानक मरने की इच्छा, 
अचानक मरने का डर! 
अजीब-सी है मन में हलचल ! 
अचानक क्रोध,
अचानक हंसी का नाट्य, 
कभी लगता, हूँ बिमार, 
कभी अत्यंत कमजोर
तो कभी मजबूत चट्टान! 
अजीब से हैं हालात! 
कभी भीड़ में भी 
तन्हाई का एहसास 
और कभी अकेले में 
भी हजारों के साथ! 
सुख की निर्मम भोलेपन में 
छिप जाती दुख की गठरी, 
कभी जिंदगी पकड़ती रफ़्तार 
तो कभी लगती ठहरी! 
कभी जिंदगी सर्द की 
सुनहरी धूप-सी 
तो कभी लगती 
जेठ की तपती दोपहरी! 

               चित्र गूगल से साभार


सोमवार, अक्टूबर 18, 2021

दांस्ता-ए- जिन्दगी

जब जिंदगी सपनों  से पहले 
पूरी होने वाली होती है, 
तब सपने नहीं, 
सिर्फ ख्वाहिशे 
पूरी करने की चाह रह जाती है! 
जब जिंदगी पेड़ पर लगे 
उस सूखे पत्ते सी हो जाती है, 
जिसकी जिंदगी तो होती है 
पर जान नहीं होती! 
तब मौत आने से पहले 
जीजिविषा मर जाती है! 
जब जिंदगी गले लगाकर पीठ में 
खंजर घोपने की फिराक में होती है, 
तब लंबी जिंदगी कि नहीं 
सिर्फ क्षणिक आनंद महसूस 
करने की चाह रह जाती है! 
जब दर्द बाहों में बाहें डालकर 
हर वक्त साथ चल रहा हो, 
तब मौत से पहले जिजीविषा मर जाती है! 
जब मंजिल तक पहुंचने से पहले 
जिंदगी अपनी मंजिल को हासिल 
करने का ठान लेती है! 
तब मंजिल की नहीं, 
सिर्फ खूबसूरत सफर में 
खानाबदोश बनने की चाह रह जाती है! 
जब जिंदगी रेत सी 
हाथ से फिसल रही होती है! 
तब लंबी जिंदगी की नहीं, 
सिर्फ बड़ी जिंदगी की चाह रह जाती है! 
पता तो सबको है, 
कि जिंदगी की मंजिल मौत है ! 
फिर भी मौत के नाम से 
आंखें नम हो जाती हैं! 


मंगलवार, अक्टूबर 05, 2021

मैं उस वक़्त सबसे असहाय होती हूंँ!

मैं उस वक्त दुनिया की 
सबसे कमजोर व असहाय 
शख़्स खुद को महसूस करती हूंँ, 
जब रोते बच्चे के आंखों से 
आंसू नहीं ले पाती हूंँ! 

मैं उस वक्त सबसे 
असहाय व लाचार होती हूंँ, 
जब मन विचलित हो जाता है 
पीड़ित लोगों के कष्ट देख 
लेकिन कष्ट हर नहीं पाती हूंँ! 

मेरी स्थिति उस वक्त 
सबसे दयनीय होती है, 
जब गलत का विरोध 
ना कर पाने के कारण 
खुद से लड़ रही होती हूंँ! 

मैं खुद को उस वक्त 
बंदी महसूस करती हूंँ, 
जब रिश्तो के बंधन में 
बंधने के कारण 
अपने विचार भी नहीं रख पाती हूंँ! 

मैं उस वक़्त खुद को
अपराधी महसूस करती हूंँ, 
जब अन्याय सह रहे लोगों के 
खातिर आवाज नहीं उठा पाती हूँ! 

मैं उस वक्त 
उस मोरनी की भांति होती हूंँ, 
जिसके पर तो बहुत आकर्षक होते हैं 
पर उड़ नहीं सकती है! 
जब वृद्ध पिता को अपनी औलादों की 
हीनता भरी निगाहों का 
सामना करते देखती हूंँ! 
पर अंदर ही अंदर 
फड़फड़ा कर रह जाती हूँ! 

मैं उस वक्त दुनिया की 
सबसे गरीब शख्स होती हूंँ, 
जब रंग-बिरंगे कपड़ों को 
लालच भरी निगाहों से 
निहार रहे बच्चे को देख 
एक आंह मात्र भर कर रह जाती हूंँ!
पर कुछ नहीं कर पाती  हूंँ! 

मैं उस वक्त संसार की 
सबसे लाचार  व स्वार्थी 
शख़्स होती हूंँ ,
जब अपने निजी स्वार्थ के चलते 
लोगों के कष्ट देख 
सिर्फ आंह भर के रह जाती हूंँ! 
पर कुछ नहीं कर पाती हूंँ! 

नारी सशक्तिकरण के लिए पितृसत्तात्मक समाज का दोहरापन

एक तरफ तो पुरुष समाज महिलाओं के अधिकारों और उनके सम्मान की बात करता है और वहीं दूसरी तरफ उनके रास्ते में खुद ही एक जगह काम करता है। जब समाज ...