गुरुवार, 27 मई 2021

अब इस अनोमल जिंदगी को यूँ ही नहीं गवाना

                     क्या कसूर है हमारा ? 
             क्यों कैद भरी जिंदगी जीने पर 
               मजबू़र कर रहा ये जमाना ? 
                   बता दे हमे ऐ जमाना ? 
         क्या लड़कियाँ नहीं जीत सकती जंग ?
                   भूल गए क्या वो अतीत ?
                झाँसी की मर्दानी की जीत ! 
                      कहाँ की है ये रीत ?
             कि लड़कियों को रखो घरों में कैद, 
                       किसने बनाई ये रीत ? 
                यदि तुम लोगों की यही है नीत, 
                तो अब तुम्हारी हार है नजदीक |
            अब कान खोल कर सुन ले ऐ जमाना |
                       इन चार दिवारियों को, 
                     तोड़ने का हमने है ठाना |
           अब नहीं रोक सकता हमे ऐ जमाना |
            अभी तक हमने तुम्हारा कहना माना , 
               तुम्हारें हर जुर्म को सहना चाहा , 
                पर अब इस अनोमल जिंदगी को
                         यूँ ही नहीं गवाना | 
               किसी भी लड़की की ख्वाहिशों को 
                    नहीं दफना सकता ऐ जमाना!
                     सदियों से दबी है जो आवाज़ , 
             उसे ज्वालामुखी के रुप मे है बाहर लाना |
                  अब इस जमाने को धूल है चटाना |
                  कलम को है अपनी ताकत बनाना |
                             जिंदगी जीने का  

                   असली मकसद अब है जाना |


14 टिप्‍पणियां:

  1. नारी अस्मिता का उदबोधन करती एक सार्थक कविता!!!!

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  2. स्त्री विमर्श का आगाज करती सार्थक रचना, बहुत बहुत शुभकामनाएं प्रिय मनीषा ।

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    1. आपका बहुत बहुत धन्यवाद और आभार 🙏🙏

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  3. This is real free voice. Amazing👍👍👍👍👍

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  4. बहुत मुश्किल है बेड़ियों को तोड़ना। स्त्री कम जिम्मेदार नहीं

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    1. हाँ सर आप सही कह रहें हैं बहुत मुश्किल तो है पर नामुंकिन नहीं यदि किसी गाँव या मोहल्ले की एक लड़की बेड़ियों को तोड़ कर आगे बढ़ती है तो अपने पीछे सारी लड़कियों के लिए रास्ते खोल देती है!

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  5. उत्तर
    1. आपका बहुत बहुत धन्यवाद और आभार 🙏🙏

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  6. Amazing post .
    You can do it.👍👍👍👍👍👍👍

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