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मंगलवार, फ़रवरी 15, 2022

एक साल बेमिसाल

आज ही के दिन मैंने इस खूबसूरत ब्लॉग जगत में कदम रखा था।ब्लॉगिंग करने का मेरा मुख्य कारण लोगों तक अपनी विचारों को साझा करना और अपने अंदर उठ रहे तमाम सवालों को लोगों के बीच रखना।जिससे मुझे आत्म संतुष्टि मिलती है।जब मैं ब्लॉगिंग नहीं करती थी तब मुझे बहुत ही घुटन होती रहती थी जब कभी किसी का बलात्कार होता,किसी हत्या भीड़ द्वारा कर दी जाती, या किसी के साथ कोई भी अन्याय होता और मेरी रातों की नींद उड़ जाती थी मुझे चैन की नींद नहीं आती अजीब सी हलचल होती रहती थी मन में घुटन होने लगती थी। ऐसा लगता था कि मैं भी इसमें शामिल हूं क्योंकि मैं कुछ नहीं कर पा रही हूं चुप रहना मेरे लिए गुनाह करने जैसा था। इसलिए मैं अक्सर व्हाट्सएप स्टेटस पर छोटे-छोटे लेख डालती रहती थी, पर पता था कोई ज्यादा पढ़ता नहीं है किसी को फर्क नहीं पड़ने वाला।और न ही सुधार आने वाला, कुछ एक थे जो पढ़ते थे।पर मुझे फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि मैं लिखती इसलिए थी कि मुझे अफसोस ना रहे कि मैं नहीं उतना भी नहीं किया जितना कर सकती थी।मैंने जब से लिखना शुरू किया यानी कि 2015 में ही ब्लाग जगत में कदम रख चुकी होती पर कुछ कारणवश ऐसा नहीं हो पाया।मुझे इस बात का थोड़ा अफसोस है पर देर से ही सही.....। 
सुनहरे शब्द
इस एक वर्ष में मुझे जितना प्यार मिला सभी प्रिय जनों से जिसे शब्दों के माध्यम से बयां कर पाना बहुत ही मुश्किल है! जब मैंने ब्लॉगिंग करना शुरू किया था मुझे ब्लॉगर तक पहुंचना भी नहीं आता था मुझे नहीं पता था कि मैं ऐसे ब्लॉगर तक कैसे पहुंचूं और ना ही किसी ब्लॉगर को जानती थी जिसके जरिए मैं पहुंच पाती।लेकिन एक दिन जब मैंने नास्तिक विचारधारा को गूगल पर सर्च किया तब मुझे एक ब्लॉग मिला जिसके माध्यम से मैं आप सभी तक पहुंच पाई, मेरे ब्लॉग पर पहली प्रतिक्रिया मेरे लिए  खूबसूरत सपने जैसा था जितेंद्र सर और रेणु मैम की हौसला बढ़ाने वाली पहली प्रतिक्रिया अद्भुत थी जिसे याद करके मैं पूरा दिन मुस्कुराती रहती थी! जिस तरह पहली पोस्ट पर सब ने खासकर कामिनी  मैम और जितेंद्र सर ने मेरा हौसला बढ़ाया और मेरे नास्तिक विचारधारा का समर्थन किया उससे मुझे हमेशा निर्भीक और स्वतंत्र होकर लिखने के लिए बहुत हिम्मत मिली।कामिनी मैम का मुझे बच्चे कहकर संबोधित करना मां की प्यारी सी झप्पी जैसी थी और रेणु मैम का हमेशा मेरी लेखनी में सुधार करवाते रहना मेरे लिए बहुत ही खूबसूरत एहसास था।
सुनहरे शब्द
शुरुआत में मुझे लगता था कि कहीं बाकी सोशल मीडिया ऐप्स की तरह यहां भी सब लोग सिर्फ औपचारिकता के लिए इतनी तारीफ के पुल तो नहीं बांध रहें हैं पर जैसे-जैसे वक्त बीतता गया साफ हो गया कि यहां पर उपस्थित सभी लोग बाकी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एकदम अलग है सभी के परिवार की तरह लगने लगे और यहां उपस्थित अधिकतर लोग मेरे माता- पिता के उम्र के हैं और सभी लोग मुझे माता-पिता के जैसा प्यार दे देते रहें हैं और मेरी गलतियों को सुधारने में मेरी मदद जिस तरह करते रहें हैं यशोदा दी की वो पांच लिंकों की प्रस्तुति जिसमें सभी रचनाएँ  मेरे ब्लॉग से ही थी और दी की वो प्रतिक्रिया मेरा हमेशा हौसला बढ़ाती है।संगीता मैम,ज्योति दी,अनिता मैम सबने मेरी लेखनी को सुधारने में बहुत ही मदद की!ब्लॉगिंग के जरिए ही मुझे जिज्ञासा मैम मिली जिनका मायका हमारे क्षेत्र में ही है पर अगर ब्लॉगिंग न करती तो कभी नहीं जान पाती, हमेशा मेरा हौसला बढ़ाती है और आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती रहतीं हैं। बहुत शुभचिंतक मिले मुझे।
सुनहरे शब्द
यूं तो नहीं है कोई सगा संबंधी 
यहां किसी का 
पर सगे संबंधियों से भी अधिक खास है ।
किसी का प्यार मां जैसा 
तो कोई पिता समान है।
कोई शुभचिंतक 
तो किसी का लाड प्यार बेहिसाब है
अलग बोली, अलग भाषा 
अलग-अलग शहरों में सभी का घर द्वार है।
पर सभी का व्यवहार एक समान है।
सब में अपनत्व और प्रेम बेमिसाल है।
मेरे परिवार से मिला मुझे 
बहुत ही प्यार और सम्मान है।
प्यार और सम्मान के लिए सभी की
मनीषा शुक्रगुजार है।
सभी प्रिय जनों को करती प्रणाम है।

शनिवार, जनवरी 22, 2022

अनुराग

 
यूं तो मुझसे छोटा है उम्र में, 
पर लगता है हम उम्र-सा।
मासूम है छोटे बच्चे-सा।
मासूमियत झलकती है, 
उसके बातों में।
गलती से भी न जाए गलत राह पे
बस यही चाह है इस दिल में।
कभी उदास कर जाता है, 
तो कभी मेरी उदासियों को 
मुस्कान में बदल जाता है।
लोगों को प्रभावित करने का तो
उसे तरीका नहीं आता है।
पर अपनी मासूमियत और साफ़ दिल से
वो सबका दिल जीत ले जाता है।
कहने को तो मुझसे छोटा है
पर हमेशा बड़ेभाई वाला फ़र्ज़ निभाता है।
जब जब बिना हेलमेट वो सफ़र करता है, 
तब मुझे सबसे अधिक गुस्सा आता है।
यूं तो रिश्ता जन्म से था,
पर कभी न सोचा था 
कि इतना हो जाएगा खास।
यूं तो सबके दिलों पर करता है राज।
पर मेरे लिए वो एक अकेला शख़्स है
जिसे देखने मात्र से  
मेरे लबों पर आ जाती है मुस्कान।
जिसके खातिर मैं अपने आत्मसम्मान को भी 
कुछ पल के लिए कर सकती हूँ दरकिनार।
खुशी मिलती है मुझे बहुत, 
खराब करके उसके 
सुलझे हुए काले घने बाल।
पर अब शायद ये अवसर मिलेगा नहीं 
इस बात का भी है मुझे एहसास।
कुछ मामलों में है 
अभी छोटे बच्चे-सा नादान 
तो कुछ में है चालीस के पार।
लड़ाई करने के लिए 
हर पल रहता है तैयार
सो प्यार से मैं कहती हूँ 
उसे लड़ाकू विमान।
आज भी याद है मुझे 
वो छोटा-सा अनुराग
जो बेवजह टीप मार कर मेरे सिर पर, 
करता था मुझे परेशान। 
यूंही नहीं नाम है उसका अनुराग।
इक छोटी सी चाह है इस दिल की 
कि बना रहे ये रिश्ता यूंही 
और होती रहें मीठी तकरार 
जितना सुरक्षित मैं महसूस करती हूँ 
उतना ही सुरक्षित हर लड़की महसूस करे उसके साथ।
     - मेरे छोटे भाई पर आधारित जो मुझसे दूर रहता है क्योंकि फुफेरा है पर दिल के बहुत ही करीब रहता है।

शनिवार, अक्टूबर 02, 2021

काश रिश्ते कच्ची मिट्टी-सा होते!

टूटते रिश्तों को 
बचावूं कैसे? 
रेत से बिखर रहे 
संभालू कैसे? 
कड़वे सच छीन रहे 
रिश्ते मुझ से! 
झूठ बोलने का 
हुनर लाऊं कैसे!? 
यादों की दलदल से 
बाहर आऊं कैसे? 
भावनाओं के सागर से 
गलतफहमियों के
घड़ियालों को 
निकालूं कैसे? 
काच-से हो रहे रिश्ते 
कच्ची मिट्टी सा 
बनाऊँ कैसे? 
काश! 
रिश्ते काच-सा 
न होकर, 
कच्ची मिट्टी-सा होते! 
जिससे इक नया 
आकार दे सकते! 

            
             तस्वीर गूगल साभार से



रविवार, सितंबर 19, 2021

पौधा प्रेम का

तस्वीर गूगल से
प्रेम का वो पौधा 
हृदय तल में, 
आज भी लगा है! 
कभी मुरझाया, 
तो कभी हरा-भरा है! 

इक कोने में वो आज भी, 
यही उम्मीद लिए खड़ा है! 
कि पड़ेगी कभी 
उसकी की नज़र मुझ पर, 
फिर प्रेम रूपी अमृत से मिलेगा, 
मुझे इक नया जीवन! 

निकलेगी नई शाखाएँ 
और नई पत्तियाँ, 
फिर से खिल उठेगी 
मुरझाई हुई कलियाँ! 
जो महका देगी ,
हृदय तल की सभी गलियां! 

जो ले कर आयेगी, 
मेरे कष्ट भरे जीवन में खुशियाँ!
इसी आश में वो आज भी खड़ा है, 
कभी मुरझाया, 
तो कभी हरा- भरा है! 

मंगलवार, सितंबर 14, 2021

जिस्म की चाह में रूह के रिश्ते तोड़े जा रही थी!

भागी तो वह अकेली थी 
उसे नहीं पता था 
कि वह अपने साथ 
बाकी लड़कियों के आंखों से 
उनके सुनहरे सपने 
छीन कर ले जा रही थी! 

खुद को तो आजाद कर रही थी 
पर बाकी लड़कियों को 
हमेशा के लिए चारदीवारी में 
कैद किए जा रही थी! 
गलती तो उसने की थी ! 
पर सजा उसके मां-बाप को मिल रही थी 

उसके चेहरे पर तो 
कलिख ही लग ही चुकी थी ! 
किंतु अपने कलिख की साया 
छोड़े जा रही थी ! 
अनेकों लड़कियों की ख्वाहिशों का 
गला घोट कर वह खुली हवा में 
सांस लेने जा रही थी! 
खुद गलत कदम उठा कर 
हर लड़की को शक के घेरे में 
कैद किए जा रही थी! 

रात के अंधेरों में चोरों की तरह भागकर 
बादशाह की 
जिंदगी जीने जा रही थी! 
समाज की रूढ़िवादी विचारधारा को 
बदलने की बजाय 
उसे और मजबूती देते जा रही थी ! 
खुद की जिंदगी में मधुर संगीत भरने के लिए 
अपने मां- बाप की जिंदगी में
समाज के ताने तोहफे में दिए जा रही थी! 

जिन की उंगलियों को 
पकड़कर चलना सीखा
उन्हीं पर उंगली उठाने का 
मौका दिए जा रही थी
एक जिस्म की चाह में वह 
रूह के रिश्ते तोड़े जा रही थी ! 
जिनके सर चढ़ी थी ,
उन्हीं को सर झुका कर 
जीने पर मजबूर किए जा रही थी! 

शुक्रवार, जून 04, 2021

जिन्दगी की शाम

तस्वीर गूगल से

 कहने को उसका पूरा परिवार है,

फिर भी उसकी जिन्दगी विरान है!

परिवार रूपी बगीचे को लगाने वाला माली,

उसी बगीचे की छांव के लिए मोहताज है!

            ◦•●◉✿✿◉●•◦

जिन पौधों को प्रेम और स्नेह 

से सीच कर हरा भरा किया था,

उन्हीं के बीच खुद आज बैठा उदास है!

झुर्रीदार चेहरे में बैचेनिया छुपी हजार है,

पर इस बैचेनियो का किसी को नही एहसास है!

                   ◦•●◉✿✿◉●•◦

जिन्दगी की इस शाम में अकेला वो आज है!

जिससे परिवार रूपी बगीचे में आया बसन्त है

उसी की जिन्दगी में पतझड़ लगा आज है!

जिन हाथो ने छोटी छोटी उंगलियों को 

पकड़ कर चलना सिखाया था,

उन्हीं उंगलियों को खुद पर उठता देख हैरान है!

                     ◦•●◉✿✿◉●•◦

होली के रंग तो उसके चेहरे पर लगे है, 

पर जिन्दगी में फीके खुशियों के रंग है!

पास होकर भी कोई नही उसके साथ है!

जो कंधे बच्चों को पूरे मेेेले की सैैैर कराया करते थे,

उन्हीं की जिन्दगी एक काठ की छड़ी पर टिकी आज है!

                      ◦•●◉✿✿◉●•◦

जिन्दगी के इस सफर में आकेला वो आज है,

बच्चों की तरह वो खुद से करता रहता संवाद है!

फिर भी अपने बच्चों की 

खुशियों के लिए हर पल करता फरियाद है!

आखिर वो इक बाप है! 

नारी सशक्तिकरण के लिए पितृसत्तात्मक समाज का दोहरापन

एक तरफ तो पुरुष समाज महिलाओं के अधिकारों और उनके सम्मान की बात करता है और वहीं दूसरी तरफ उनके रास्ते में खुद ही एक जगह काम करता है। जब समाज ...