सोमवार, 13 सितंबर 2021

जिस्म की चाह में रूह के रिश्ते तोड़े जा रही थी!

भागी तो वह अकेली थी 
उसे नहीं पता था 
कि वह अपने साथ 
बाकी लड़कियों के आंखों से 
उनके सुनहरे सपने 
छीन कर ले जा रही थी! 

खुद को तो आजाद कर रही थी 
पर बाकी लड़कियों को 
हमेशा के लिए चारदीवारी में 
कैद किए जा रही थी! 
गलती तो उसने की थी ! 
पर सजा उसके मां-बाप को मिल रही थी 

उसके चेहरे पर तो 
कलिख ही लग ही चुकी थी ! 
किंतु अपने कलिख की साया 
छोड़े जा रही थी ! 
अनेकों लड़कियों की ख्वाहिशों का 
गला घोट कर वह खुली हवा में 
सांस लेने जा रही थी! 
खुद गलत कदम उठा कर 
हर लड़की को शक के घेरे में 
कैद किए जा रही थी! 

रात के अंधेरों में चोरों की तरह भागकर 
बादशाह की 
जिंदगी जीने जा रही थी! 
समाज की रूढ़िवादी विचारधारा को 
बदलने की बजाय 
उसे और मजबूती देते जा रही थी ! 
खुद की जिंदगी में मधुर संगीत भरने के लिए 
अपने मां- बाप की जिंदगी में
समाज के ताने तोहफे में दिए जा रही थी! 

जिन की उंगलियों को 
पकड़कर चलना सीखा
उन्हीं पर उंगली उठाने का 
मौका दिए जा रही थी
एक जिस्म की चाह में वह 
रूह के रिश्ते तोड़े जा रही थी ! 
जिनके सर चढ़ी थी ,
उन्हीं को सर झुका कर 
जीने पर मजबूर किए जा रही थी! 

28 टिप्‍पणियां:

  1. कभी-कभी किसी एक की गलती का खामियाजा बहुतों को भुगतना पड़ता है

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    1. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद आदरणीय सर

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  2. अपनी चाहत में यही तो नहीं दिखता किसी को की कितनों की ज़िन्दगी में दुख भरा जा रहा है ।
    गहन सोच ।

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  3. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 15 सितंबर 2021 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
    !

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    1. मेरी रचना को "5 लिंको का आनंद में " जगह देने के लिए आपका तहे दिल से बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय मैम🙏

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  4. खुद को तो आजाद कर रही थी
    पर बाकी लड़कियों को
    हमेशा के लिए चारदीवारी में
    कैद किए जा रही थी!
    गलती तो उसने की थी !
    पर सजा उसके मां-बाप को मिल रही थी ..सामाजिक चिंतन से ओतप्रोत रचना ।

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  5. सम्बन्धों की डोर मृदुल है,
    खुद से अधिक बचा कर रखना।

    सुन्दर और व्यवहारिक पंक्तियाँ।

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    1. आपका तहे दिल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय सर🙏🙏

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  6. वाह!मनीषा जी लाजवाब यथार्थ।
    सादर

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    1. सहृदय आपका बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय मैम🙏🙏🙏🙏

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  7. गहन विचार परक चिंतन देती रचना ।
    भाव खुलकर मुखरित हुए हैं ।
    बना सुंदर सृजन के लिए।

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  8. जिस्म कि चाह में रूह के रिश्‍तें तोड़े जा रही थी क्‍योंकि वो जानती थी कमोंबहोत पुरी दुनिया
    इस आभा के आगे झुकती है तब भी तो इन्‍सानी पहले भी बिकता था आज भी बिकती है ।
    और रूह । रूह ! पहले भी अजर अमर था आज भी है वो कल भी नहीं दिखता था आज भी नहीं दिखता है । यही हक्‍कीत है ।

    "हर रिश्‍तें की बुनियाद अब पत्‍थरों पर खींचें जाते है
    रूह से रिश्‍तें अब किस्‍से कहानीयों में दिखतें है । "

    अति सुंदर एवं भावनात्‍मक रचना !

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    उत्तर
    1. आपका बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय सर🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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  9. बहुत गहराई है आपके लेखन में ..,इसी तरह लिखती रहिए । शुभकामनाएँ ।

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    उत्तर
    1. आपका तहे दिल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय मैम मेरा हौसला अफजाई करने के लिए आप लोगों की प्रतिक्रिया बहुत मायने रखती है! 🙏🙏🙏🙏

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  10. उत्तर
    1. मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सर!

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  11. रात के अंधेरों में चोरों की तरह भागकर
    बादशाह की
    जिंदगी जीने जा रही थी!
    समाज की रूढ़िवादी विचारधारा को
    बदलने की बजाय
    उसे और मजबूती देते जा रही थी !
    बहुत सटीक...
    जो छुपकर या भागकर किया जाय वह प्रेम हो ही नहीं सकता...
    बहुत ही गहन चिन्तनपरक सृजन
    वाह!!!

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    उत्तर
    1. इतने बेहतरीन प्रतिक्रिया देने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय मैम 🙏

      हटाएं

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