रविवार, 17 अक्तूबर 2021

दांस्ता-ए- जिन्दगी

जब जिंदगी सपनों  से पहले 
पूरी होने वाली होती है, 
तब सपने नहीं, 
सिर्फ ख्वाहिशे 
पूरी करने की चाह रहे जाती है! 
जब जिंदगी पेड़ पर लगे 
उस सूखे पत्ते सी हो जाती है, 
जिसकी जिंदगी तो होती है 
पर जान नहीं होती! 
तब मौत आने से पहले 
जीजिविषा मर जाती है! 
जब जिंदगी गले लगाकर पीठ में 
खंजर घोपने की फिराक में होती है, 
तब लंबी जिंदगी कि नहीं 
सिर्फ क्षणिक आनंद महसूस 
करने की चाह रह जाती है! 
जब दर्द बाहों में बाहें डालकर 
हर वक्त साथ चल रहा हो, 
तब मौत से पहले जिजीविषा मर जाती है! 
जब मंजिल तक पहुंचने से पहले 
जिंदगी अपनी मंजिल को हासिल 
करने का ठान लेती है! 
तब मंजिल की नहीं, 
सिर्फ खूबसूरत सफर में 
खानाबदोश बनने की चाह रह जाती है! 
जब जिंदगी रेत सी 
हाथ से फिसल रही होती है! 
तब लंबी जिंदगी की नहीं, 
सिर्फ बड़ी जिंदगी की चाह रह जाती है! 
पता तो सबको है, 
कि जिंदगी की मंजिल मौत है ! 
फिर भी मौत के नाम से 
आंखें नम हो जाती हैं! 


मंगलवार, 12 अक्तूबर 2021

संपूर्ण नारीत्व का पहचान है,वो पाच दिन!

जिस लाल रंग से 
एक लाल का निर्माण हुआ, 
इक माँ को लाल 
और इक खानदान को 
अपना चिराग मिला! 
उसी लाल रंग को 
एक माँ को अपने लाल से 
छुपाना क्यों पड़ा? 
यदि वह लाल रंग अशुद्ध होता है, 
तो उसी अशुद्धता से 
इस सृष्टि का निर्माण हुआ, 
फिर कैसे कोई पवित्र 
और कोई अपवित्र हुआ? 
समाज समझता है जिसको घृणित, 
उसी से हुआ है निर्मित! 
अभिशाप नहीं, अभिमान है,
वो पाच दिन
नारी की पवित्रता का सूचक है,
वो पाच दिन
संपूर्ण नारीत्व का पहचान है, 
वो पाच दिन! 
स्त्री के यौवन का श्रृंगार है, 
वो पाच दिन! 
रूढ़िवादिता की सोच से जो दाग है, 
अशुद्धता की निशानी , 
वास्तव में वो मातृत्व अवस्था में 
कदम रखने की है निशानी! 
उस रंग के बिना एक स्त्री 
माँ होने के बजाय बांझ है बन जाती!
इती सी बात इस समाज को 
समझ क्यों नहीं आती? 
21वीं सदी में भी जो लोग 
उस लाल रक्त को नापाक कहते हैं 
ऐसी सोच को हम ख़ाक़ कहते हैं! 
                                       -  मनीषा गोस्वामी 
            
मैं देख रहीं हूँ कि बहुत से लोग ये पोस्ट देख चुकें हैं पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दे रहें हैं, शायद वे ऐसे विषयों पर प्रतिक्रिया देना उचित नहीं समझते !  तारीफ न सही आलोचना तो कर ही सकते थे! 
कमाल है! 
आज भी ऐसी महान आत्माऐं हमारे बीच ब्लॉगर के रूप में उपस्थित हैं पर अफ़सोस हम देख नहीं सकते काश की दर्शन भी हो पाता तो हम धन्य हो जाते! 
        

शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2021

रजत पुलिन

दिवसावसान के पश्चात , 
जब आई 
पूर्णिमा की रात! 
चांदनी रात को , 
निरवता लगा रही थी,
चार चांद! 
लोल लहरें मंद स्वर 
के साथ कर रहीं थीं! 
नृत्य का अभ्यास! 
निरवता को तोड़ते हुए, 
जा रही थी जिसकी 
दूर तक आवाज! 
तमिस्त्रतोम को विभेदित
करती रेशमी विभा! 
बढ़ा रही थी
राका निसि की सोभा! 
व्योम मण्डल की 
स्वाति-घटा को, 
पेखि-पेखि हृदय तल में, 
उत्पन्न हो रहा था अनुराग! 
मंत्रमुग्ध कर रही थी, 
यमुना की अविरल धार! 
यमुना के निर्मल जल में, 
शशि की मोहक छवि देख, 
लबों पर आ रही थी मुस्कान! 
देख पूर्णिमा का अद्भुत श्रृंगार, 
मन प्रफुल्लित हो रहा था बार-बार

सोमवार, 4 अक्तूबर 2021

मैं उस वक़्त सबसे असहाय होती हूंँ!

मैं उस वक्त दुनिया की 
सबसे कमजोर व असहाय 
शख़्स खुद को महसूस करती हूंँ, 
जब रोते बच्चे के आंखों से 
आंसू नहीं ले पाती हूंँ! 

मैं उस वक्त सबसे 
असहाय व लाचार होती हूंँ, 
जब मन विचलित हो जाता है 
पीड़ित लोगों के कष्ट देख 
लेकिन कष्ट हर नहीं पाती हूंँ! 

मेरी स्थिति उस वक्त 
सबसे दयनीय होती है, 
जब गलत का विरोध 
ना कर पाने के कारण 
खुद से लड़ रही होती हूंँ! 

मैं खुद को उस वक्त 
बंदी महसूस करती हूंँ, 
जब रिश्तो के बंधन में 
बंधने के कारण 
अपने विचार भी नहीं रख पाती हूंँ! 

मैं उस वक़्त खुद को
अपराधी महसूस करती हूंँ, 
जब अन्याय सह रहे लोगों के 
खातिर आवाज नहीं उठा पाती हूँ! 

मैं उस वक्त 
उस मोरनी की भांति होती हूंँ, 
जिसके पर तो बहुत आकर्षक होते हैं 
पर उड़ नहीं सकती है! 
जब वृद्ध पिता को अपनी औलादों की 
हीनता भरी निगाहों का 
सामना करते देखती हूंँ! 
अंदर ही अंदर फड़फड़ा कर रह जाती हूँ! 

मैं उस वक्त दुनिया की 
सबसे गरीब शख्स होती हूंँ, 
जब रंग-बिरंगे कपड़ों को 
लालच भरी निगाहों से 
निहार रहे बच्चे को देख 
एक आंह मात्र भर कर रह जाती हूंँ!
पर कुछ नहीं कर पाती  हूंँ! 

मैं उस वक्त संसार की 
सबसे लाचार शख़्स व स्वार्थी 
शख़्स होती हूंँ ,
जब अपने निजी स्वार्थ के चलते 
लोगों के कष्ट देख 
सिर्फ आंह भर के रह जाती हूंँ! 
पर कुछ नहीं कर पाती हूंँ! 

शनिवार, 2 अक्तूबर 2021

काश रिश्ते कच्ची मिट्टी-सा होते!

टूटते रिश्तों को 
बचावूं कैसे? 
रेत से बिखर रहे 
संभालू कैसे? 
कड़वे सच छीन रहे 
रिश्ते मुझ से! 
झूठ बोलने का 
हुनर लाऊं कैसे!? 
यादों की दलदल से 
बाहर आऊं कैसे? 
भावनाओं के सागर से 
गलतफहमियों के
घड़ियालों को 
निकालूं कैसे? 
काच-से हो रहे रिश्ते 
कच्ची मिट्टी सा 
बनाऊँ कैसे? 
काश! 
रिश्ते काच-सा 
न होकर, 
कच्ची मिट्टी-सा होते! 
जिससे इक नया 
आकार दे सकते! 

            
             तस्वीर गूगल साभार से



मंगलवार, 28 सितंबर 2021

जीवित वृद्धजनों को सम्मान व प्यार दो तो बात बने!

तस्वीर गुगल साभार से
मेरे जेहन में पितृपक्ष मैं हो रही श्राद्ध को देखकर कुछ सवाल उठ रहे हैं कि जब लोग अपने घर के बुजुर्गों से इतना प्यार करते हैं कि उनकी याद में पितृपक्ष में प्रीतिभोज का आयोजन करते हैं और  उनके आगमन के लिए चौखट को फूलों से सजातें हैं! तो फिर वृद्धाश्रम क्यों खुले होते हैं हमारे शहर में क्या जरूरत ? मैं ये नहीं कहती कि  पितृपक्ष में ऐसा ना करें, बिल्कुल करें,शौक से कर लेकिन जब जीवित रहें तब भी इतना ही प्यार और सम्मान दे तो अधिक बेहतर होगा! और तब यह सब भी शोभा देगा! क्योंकि मरने के बाद वह इंसान देखने नहीं आता है कि कौन मुझे कितना प्यार कर रहा है ! सिर्फ समाज और दुनिया देखती है, कुछ लोग तो दिखावे के लिए ही करते हैं बात कड़वी है पर सच है! देखा है मैंने उन लोगों को पितृपक्ष में श्राद्ध पर बहुत बड़ा प्रीतिभोज का आयोजन करते हुए जो घर के बुजुर्गों के जीवित रहने पर उन्हें घृणा भरी नजर से देखते थे !और ताने पे ताने  सुनाते रहते थे खासकर घर की महिलाएं  शहर में तो वृद्ध आश्रम भेज देते हैं लेकिन गांव में  बुजुर्ग दंपत्ति को दो टुकड़ों में बांट दिया जाता है बड़े के पास पिता, तो छोटे के पास माँ और जिनके यहाँ एक ही वृद्ध व्यक्ति होता है! उसे एक महीना बड़े बेटे के पास, तो एक महीना छोटे बेटे के पास रह कर! ऐसे करके बची हुई जिंदगी गुजारनी पड़ती है! जिन बुजुर्ग दंपत्ति के पास एकमात्र सहारा होता है! उनकी जिंदगी तो और भी दर्द भरी हो जाती है! जब तक जीवित होते हैं फूटी आंख भी नहीं भाते हैं खासकर औरतों को जो एक भी मौका नहीं छोड़ती हीनता का भाव  महसूस कराने में बुजुर्गों को, और का बात-बात पर ताने मारती रहती है कि इनकी वजह से हमारी रातों की नींद हराम हो चुकी है पूरी रात सिर पर ही खाता रहता है! बुड्ढा नींद  भी नहीं आती है इसे, अरे! नींद आय भी कैसे, पूरा दिन पड़े पड़े बस पलंग तो तोड़ता रहता है! जब कुछ काम धंधा करेगा तब नींद आएगी !ऊपर से पूरा दिन बड़बड़-बड़बड़ करता रहता है हर काम में बस नुक्स निकालता रहता है! आदि बहुत कुछ सुनाती रहतीं हैं! ऐसी बातें करने वाले और वे लोग जो घर में वृद्ध जन के होने पर मेहमानों के सामने शर्म महसूस करते हैं! उन्हीं को मैंने पितृपक्ष में बुजुर्गों के श्राद्ध पर मेहमानों को शौक प्रीतिभोज निमंत्रण भेजते हुए देखा है! मुझे समझ नहीं आता कि इन्हें,उन्हीं बुजुर्गों के  श्राद्ध पर मेहमानों को बुलाते हुए शर्म नहीं आती? तब शर्म नहीं महसूस होता ? जब तक जीवित थे तब तो बहुत शर्म महसूस होता था! तो फिर ये दिखावा किस लिए करते हैं? जबकि सबको पता होता है कि बाप के जीवित होने पर कितने खुश थे यह लोग! यह लोग एक बार भी यह क्यों नहींं सोचते इसका असर उनके बच्चों पर कैसा पड़ेगा अगर यह ऐसा करेंगेे तो बच्चे भीी तो इन्हीं से सीखेंगे इन्हीं की तरह जीवित रहने पर कद्र नहीं करेंगे और मरणोपरांत धूमधाम से श्राद्ध करेंगे! 
पितृपक्ष में श्राद्ध करने से अधिक महत्वपूर्ण है घर के  जीवित बुजुर्गों को प्यार सम्मान देना ! जिस उम्र में सबसे ज्यादा व्यक्ति अकेलापन महसूस करता है उस उम्र में उसे  अपनेपन का एहसास करा कर खुश रखना! 

बुधवार, 22 सितंबर 2021

राष्ट्र चिंतक मतलब भगत सिंह

  आप हमेशा मेरे❤रहेगें!आप से मेरी हिम्मत है! 
किसी भी राष्ट्र का निर्माण एक माँ से आरंभ होता है , क्योंकि किसी भी राष्ट्र का अभिन्न अंग अर्थात मानव एक माँ की कोख में ही नौ महीने तक पलता है! जब एक माँ नौ महीने एक बच्चे को अपने गर्भ मैं पालती है तो वो सिर्फ़ एक बच्चे को ही नही अपितु एक मुल्क के सुनहरे भविष्य को अपनी कोख में पाल रही होती है! जब वो बच्चे की अच्छी सेहत के खातिर अपने खान-पान के साथ समझौता कर रही होती है, तब वह एक संबल राष्ट्र का निर्माण कर रही होती है ,क्योंकि एक स्वस्थ युवक से ही एक संबल राष्ट्र का निर्माण होता है । इस लिए एक माँ को राष्ट्रजननी कहना गलत नहीं होगा ! 1907 भारत का स्वर्णिम काल जब एक माँ के गर्भ में भारत को खुद पर गर्व महसूस कराने वाला इतिहास और क्रांति सांसे ले रहा था ! इसके साथ ही एक निर्भीक क्रांति और भारत माँ के लिए अपनी जान हंसते- हंसते न्यौछावर करने वाला राष्ट्रपुत्र , राष्ट्रजननी की कोख में पल रहा था । 28 सितंबर (1907) के सूरज की चमक धूमिल मालूम पड़ रही थी उसकी तेज के सामने! ये वह दिन था जब एक ऐसे महानायक और राष्ट्र चिंतक का जन्म हुआ था के साथ नई चेतना, नई विचारधारा का जन्म हुआ था ।यानी कि हम सबके प्रिय सरदार भगत सिंह का जन्म हुआ था!एक ऐसे स्वतंत्र विचार का ,जो व्यक्ति को जेल की काल कोठरी में भी आज़ाद रखता था ! और बेखौफ परिंदे की तरह ऊंची उड़ान भराता था । कुछ इस तरह-
      "राख का हर एक कण, 
      मेरी गर्मी से गतिमान है, 
      मैं एक ऐसा पागल हूँ, 
     जो जेल में भी आज़ाद है!"
भगत सिंह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक विचारधारा एक इतिहास और एक क्रांति है! जिससे आज की युवा पीढ़ी में जोश आता है! एक ऐसा नास्तिक जो आस्तिकों के हृदय पर राज करता है! आज इक्कीसवीं सदी में जिस उम्र को अपनी जिम्मेदारी उठाने का अधिकार नहीं है! जिसे कानूनन अपराध माना जाता है ! उसी कच्ची उम्र में (1919) जलियावाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह के बाल मन पर इतना गहरा असर डाला कि नाजुक कंधों ने मजबूत इरादों के साथ समस्त देशवासियों को अर्थात संपूर्ण भारतवर्ष को अंग्रेज़ो से गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने का जिंमा उठा लिया! भगत सिंह की उम्र भले ही कच्ची थी ,पर भारत माँ से किया गया वादा पक्का था।
             "उम्र छोटी थी,
         पर समझदार बड़े थे।   
       कच्ची उम्र ने भारत माँ से 
         वादे पक्के किये थे।।"
ऐसे पुत्र पर किस माँ को नाज़ नहीं होगा ! हर माँ जिसको अपना पुत्र कहने पर गर्व महसूस करती है! ऐसे पुत्र की चाह कौन सी माँ नहीं रखती है! जो युवा भगत सिंह के विचारों और सिद्धांतों का अनुसरण करते हैं!उनकी ताकत हैं! अगर मेरी चले तो मैं भगत सिंह की जयंती जितनी लोग कृष्ण जन्म अष्टमी को धूम -धाम से मनातेे हैं! उससे भी अधिक धूमधाम सेे मनाऊँ! कुछ चीजें देखकर मन को बहुत ठेस पहुंचता हैं ,जैसे महात्मा गाँधी जी का जन्म दिवस हर किसी को याद रहता है! 2अक्टूबर मतलब गांधी जयंती! बच्चे बच्चे को पता है ! पर 28 सितंबर के बारे में नहीं पता! 28 सितंबर सुनकर किसी को कुछ याद नहीं आता! सोशलमीडिया पर अभी से गाँधी जी की जयंती के लिए शुभकामनाएं वाले संदेश तैरने लगे हैं, पर भगत सिंह की जयंती की किसी को खबर नहीं जबकि भगत सिंह की पहले है! मुझे गांधी जी से जलन नहीं है! न ही गांधीजी के लिए जो लोगों का जो प्रेम प्रदर्शन है उससे कोई आपत्ति है! मैं बस इतना चहाती हूँ कि भगत सिंह का जन्म दिवस भी बच्चे बच्चे को याद हो! भगत सिंह के बारे में सब कुछ पता हो और उनके विचार भी! बहुत कम लोगों को भगत सिंह का जन्म दिवस याद रहता है! जो कि अत्यंत दुखद है! इससे भी अधिक मुझे तब दुख होता है जब आज की युवा पीढ़ी के पास इस महानायक और राष्ट्र चिंतक के बारे में जानने के लिए वक्त नहीं होता है ! जिसने अपना पूरा जीवन देश के नाम समर्पित कर दिया!  जिसने हमारें लिए फांसी के फंदे को हंसते हंसते चूम लिया! पर मुझे है कि उम्मीद कि ब्लॉग जगत के सभी ब्लॉगर खासकर चर्चा मंच कुछ ख़ास जरूर करेंगे भगत सिंह के जन्म दिवस पर !खैर!  वैसे तो मुझे भगत सिंह के सभी कथन बहुत अच्छे लगते हैं, पर ये कथन जो मुझे सबसे ज़्यादा हिम्मत देता है -
                    दिल में जो जख्म है 
                    सारे फूल के गुच्छे हैं
                   हमें पागल ही रहने दो, 
                   हम पागल ही अच्छे हैं! 
आने वाले स्वर्णिम दिन (28 सितम्बर)की सभी को बधाई!  
कुछ पंक्ति मेरे आदर्श सरदार भगत सिंह और उनकी माँ को समर्पित- 
पावन है वह धरा 
जहाँ तुझ जैसे वीर 
सपूत का जन्म हुआ! 
कितनी खुश किस्मत है ! 
वह माँ जिसकी कोख में
भारत का शानदार
इतिहास पला! 
नमन् है उस माँ को 
जिसने हमें राष्ट्र पुत्र दिया! 



दांस्ता-ए- जिन्दगी

जब जिंदगी सपनों  से पहले  पूरी होने वाली होती है,  तब सपने नहीं,  सिर्फ ख्वाहिशे  पूरी करने की चाह रहे जाती है!  जब जिंदगी पेड़ ...