शनिवार, जनवरी 22, 2022

अनुराग

 
यूं तो मुझसे छोटा है उम्र में, 
पर लगता है हम उम्र-सा।
मासूम है छोटे बच्चे-सा।
मासूमियत झलकती है, 
उसके हर इक बात में।
गलती से भी न जाए गलत राह पे
बस यही चाह है इस दिल में।
 कभी उदास कर जाता है, 
तो कभी मेरी उदासियों को 
मुस्कान में बदल जाता है।
लोगों को प्रभावित करने का 
उसे तरीका नहीं आता है।
पर अपनी मासूमियत और साफ़ दिल से
वो सबका दिल जीत ले जाता है।
कहने को तो मुझ से छोटा है
पर हमेशा बड़ेभाई वाला फ़र्ज़ निभाता है।
जब जब बिना हेलमेट वो सफ़र करता है, 
तब मुझे सबसे अधिक गुस्सा आता है।
घर वो मेरे जब भी आता है,  
भावनाओं पर मर्यादाओं के 
पहरों के चलते कम होती है बात, 
पर कभी भी कम न हुआ 
इस कारण हामरे बीच अनुराग। 
यूं तो रिश्ता जन्म से था,
पर कभी न सोचा था 
कि इतना हो जाएगा खास।
यूं तो सबके दिलों पर करता है राज।
पर मेरे लिए वो एक अकेला शख़्स है
जिसे देखने मात्र से  
मेरे लबों पर आ जाती है मुस्कान।
जिसके खातिर मैं अपने आत्मसम्मान को भी 
कुछ पल के लिए कर सकती हूँ दरकिनार।
खुशी मिलती है मुझे बहुत 
खराब करके उसके 
सुलझे हुए काले घने बाल।
पर अब शायद ये अवसर मिलेगा नहीं 
इस बात का भी है मुझे एहसास।
कुछ मामलों में है 
अभी छोटे बच्चे-सा नादान 
तो कुछ में है चालीस के पार।
लड़ाई करने के लिए 
हर पल रहता है तैयार
सो प्यार से मैं कहती हूँ 
उसे लड़ाकू विमान।
आज भी याद है मुझे 
वो छोटा-सा अनुराग
जो बेवजह टीप मार कर मेरे सिर पर, 
करता था मुझे परेशान। 
यूंही नहीं नाम है उसका अनुराग।
इक छोटी सी चाह है इस दिल की 
कि बना रहे ये रिश्ता यूंही 
और होती रहें मीठी तकरार 
जितना सुरक्षित मैं महसूस करती हूँ 
उतना ही सुरक्षित हर लड़की महसूस करे उसके साथ।
     - मेरे छोटे भाई पर आधारित जो मुझसे दूर रहता है क्योंकि फुफेरा है पर दिल के बहुत ही करीब रहता है।

बुधवार, जनवरी 19, 2022

एक कदम जिम्मेदार नागरिक बनने की ओर


हो सकता है यह लेख बहुतों को रास न आये और उन्हें लगे कि हर काम में मुझे नकारात्मकता ही नज़र आती है।खास उन लोगों को जो ऐसा करते हैं।जरूरी तो नहीं कि मैं पूर्णतः सही ही हूँ! तो इस लिए उन लोगों से निवेदन है कि कृपया तारीफों के पुल बांधने के बजाय अपनी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया दे और अपनी राय प्रकट करें जो वो सच में सोचते हैं और तभी ऐसा करते हैं ।चाहे वो आलोचनात्मक हो या और। 
चलो अब लेख पढ़ते हैं- 
मैं अक्सर देखती हूं कि लोग कुछ ही दूरी तय करने के लिए चार पहिया वाहन का सहारा लेते हैं वह भी अकेले जाने के लिए! जी करता है कि इन लोगों को रास्ते में ही रोक कर बोलूं कि मानती हूं आपके पास बहुत पैसा है इसलिए आपको पेट्रोल-डीजल को यूंही जलाते हुए एक बार भी नहीं सोचना पड़ता! जहां एक लीटर की जरूरत होती है वहां दो लीटर का उपयोग करते हुए एक बार भी नहीं हिचकिचाते ! इससे दूसरे लोगों को कितनी असुविधा होती है और परेशानियों का सामना करना पड़ता है कभी सोचा है? और तो और इससे देश का कितना नुकसान होता है कभी सोचा है? बेशक आपकी गाड़ी आपके पैसे पर चलती है ,पर इससे देश की आर्थिक स्थिति पर बहुत ही प्रभाव पड़ता है! जब आप कुछ ही किलोमीटर पर अकेले ही जाने के लिए बाइक की बजाय फोर व्हीलर का सहारा लेते हैं तो इससे ट्राफिक बढ़ती है!जहां दो से तीन बाइक निकल सकती है यानि तीन से छ: व्यक्ति आराम से निकल सकते हैं  वहां से मात्र एक गाड़ी निकलती है यानि कि मात्र एक व्यक्ति! इस कारण से ट्रॉफी बढ़ता है और इससे सभी के वक्त की बर्बादी होती है! और आपके वक्त की भी इसलिए दूसरों के लिए ना सही तो अपने लिए ही ऐसा करने से बचें! दूसरा नुकसान देश की आर्थिक स्थिति का होता है एक लीटर पेट्रोल-डीजल के बजाय दो लीटर(दुगने इंधन ) का इस्तेमाल होने पर पेट्रोल और डीजल की मांग बढ़ती है और जब इंधन की मांग बढ़ती है तो विदेशों से अधिक तेल का आयात करना पड़ता है ! इससे हमारे देश की मुद्रा यानी कि पैसे का इस्तेमाल विदेशी चीजों पर अधिक होता है|जिससे हमारी मुद्रा का बहुत नुकसान होता है हमें अपने पास विदेशी धन इकट्ठा करने के बजाय विदेशों में अपना धन खर्च करना पड़ता है ! जिसका सीधा असर हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है जिससे महंगाई बढ़ती है! और हमारी मुद्रा की कीमत घटती है! इसलिए अगर देश की थोड़ी भी चिंता है तो कृपया अपनी हरकतों से बाज आइए! और तीसरा नुकसान तो आपको पता ही होगा लेकिन फिर भी याद दिला देती हूं! जब एक लीटर तेल के बजाय दो लीटर तेल का इस्तेमाल करते हैं! तो दुगना ईंधन इस्तेमाल करने से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन भी दुगना होता है ! जोकि अत्यंत घातक है भविष्य के लिए! अगर ऐसे ही आप लोग कुछ ही दूरी पर जाने के लिए ऐसे वाहन का सहारा लेंगे जिसमें दुगने इंधन का उपयोग होता हो तो 2070 तक नेट जीरो (कार्बन मुक्त) होने का तो पता नहीं पर 2030 तक विश्व के तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने की संभावना जो जताई गई है उससे आगे निकल जाओगे! इसमें कोई शक नहीं! और तो और आप अपने बच्चे के जीवन को खतरे में डाल रहे हैं इसलिए बच्चे को पढ़ाने लिखाने की क्या जरूरत? सुनहरे भविष्य के सपने दिखाने की क्या जरूरत?क्यों उनकी आंखों में सुनहरे सपने डाल रहे हो? जब भविष्य ही नहीं रहेगा तो सुनहरा क्या खाक बनेग! जब सांस लेने के लिए शुद्ध हवा ना होगी पीने के लिए शुद्ध पानी नहीं होगा तो भविष्य सुनहरा कैसे होगा?क्या बिना शुद्ध हवा और पानी के भविष्य सुनहरा हो सकता है? अब आप कहोगे कि पानी को मशीन से शुद्ध कर लेंगे और हवा को भी ! बिल्कुल सही कहा आपने पर यह हम मनुष्य कर सकते हैं जानवर और पेड़ पौधे नहीं |क्या बिना पेड़ -पौधे और जानवर के मानव का जीवन संभव है?नहीं ना ये तो आप भी जानते होंगे! मानव जीवन के लिए जैव विविधता अनिवार्य है! इसलिए महाशय कृपया अपने पैसे की अकड़ कहीं और पर दिखाया कीजिए जिससे सब को फायदा हो अगर किसी को फायदा ना हो तो कमसेकम नुकसान तो ना ही हो! पर अफसोस मैं किसी की कार रोककर इतना सारा भाषण तो नहीं दे सकती और ना ही कोई इतनी देर तक मुझे चुपचाप सुनता रहेगा! या तो इतनी देर में मुझे अस्पताल पहुंचा देगा या फिर मुझे धक्का मार कर नौ दो ग्यारह हो जाएगा!😄 पर कोई बात नहीं! यहां तो दे सकती हूं ,और जरूरी थोड़ी है कि ऐसे लोग सिर्फ सड़क पर ही मिलते हैं| ऐसे लोग हमारे ब्लॉग जगत पर भी होंगे मुझे पूरा विश्वास है| इसलिए मैंने यहीं पर अपनी बात रख दिया| अगर समझना चाहते होंगे तो समझ जाएंगे नहीं तो क्या ही कर सकते हैं! कुत्ते की दुम सीधी ठोड़ी की जा सकती! वैसे ही इन लोगों को भी .....! 
जैसा कि पता है कि पिछले महीने हुई COP-26 की मीटिंग में प्रधानमंत्री जी ने 2070 तक नेटजीरो यानी कि कार्बन मुक्त होने का (जितना कार्बन उत्सर्जित करेंगे उतना ही अवशोषित करेंगे)वादा किया है| इस वादे को पूरा करने के लिए आमजन से लेकर खास व्यक्ति हर किसी को पूरा सहयोग देना होगा| तभी यह सम्भव हो पायेगा! इसलिए यहां उपस्थित सभी आदरणीय और प्रिय जन से हाथ जोड़कर कर सच्चे दिल से निवेदन है  कि कृपया ऐसा कुछ भी काम मत करिये अगर करते थे तो आगे से मत किया कीजिएगा! जिससे आमजन से लेकर देश और पर्यावरण को नुकसान हो! ये हमारे देश के लिए सच्ची देश भक्ति से कम नहीं होगी !🙏🙏🙏

गुरुवार, जनवरी 13, 2022

सूर्य सा जलकर सूर्य सा चमकना है

ये हवाएं जो इतरा रहीं हैं 
ये सोच कर कि इक झोके से
मेरे हौसले उड़ा ले जाएगी|
पर इन्हें कहाँ मालूम कि
ये मुझे तूफानों से लड़ने के काबिल बना जाएगी|
ये चिंगारियाँ जो 
मुझे जला कर लाल लाल 
आंखें दिखा रहीं हैं, 
इन्हें बता दे कोई कि
ये मुझे सुलगते अंगारों पर 
चलने के लिए तैयार कर रहीं हैं|
ये काँटे मुझे थोड़ा सा जख्म दे कर 
बहुत ही गर्वान्वित हो रहें हैं, 
बेचारे को कहाँ मालूम कि
मैं खंजर के वार को सह सकूँ 
उतना मजबूत बना रहें हैं|
ये लोग जो मेरा साथ छोड़ कर
खुश हो रहें हैं, 
कोई जा के बताए इन 
भोले-भाले लोगों को कि, 
ये मुझे अकेला नहीं बल्कि 
मुझे, खुद से मिलने का अवसर दे रहें हैं|
ये लोग जो मेरी असफलताओं पर
मेरा अपमान व उपहास कर रहें हैं
इन्हें नहीं पता कि, 
यही लोग भविष्य मेरे सम्मान का 
कारण बनने जा रहें हैं|
व्यंग्यों के चुभते बाड़ , 
           मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहें हैं|

                               -तस्वीर गूगल साभार से 

सोमवार, जनवरी 10, 2022

हिंदी है हमारी पहचान

हिंद से ये हिंदी बनी  है 
और हिंद से हुआ
हिंदुस्तान का निर्माण! 
हिंदी से है हमारी पहचान ! 
हिंदी है साहित्य का श्रृंगार! 
हिंदी में बसती है साहित्यकारों की जान
हिंदी साहित्य में लगाती चार चांद! 
हिंदी के महाकवियों से मिली
हमें इक नई पहचान! 
हिंदी ने गढ़ा खूबसूरत महाकाव्य ! 
हिंदी से होता अपनत्व का एहसास!
आत्मा है हिंदी जिस्म है हिंदुस्तान! 
हिंदी के बिना अधूरा हिंदुस्तान! 
हिंदी से हुई क्रांति की शुरुआत! 
हिंदी है हमारे संस्कृति की पहचान! 
हिंदी है हिंदुस्तान का स्वाभिमान! 
भले ही अन्य भाषाओं का आज
हो रहा इस्तेमाल! 
किन्तु हिंदी आज भी करती है
हर हिंदुस्तानी के दिल पर राज! 
हिंदी से ही बनेगा विश्व गुरु हिंदुस्तान! 
हिंदी मात्र भाषा नहीं, 
ये है हमारी संस्कृति और संस्कार ! 
हिंदी है हिंदुस्तान की 
आन बान और शान! 
हिंदी पर करता है,
                             हर हिन्दुस्तानी नाज!      

गुरुवार, जनवरी 06, 2022

दहेज़ एक अभिशाप

आज सुबह लगभग 5:00 बजे  मैं जब सो रही थी तभी मुझे एक सपना आया सपने में मैं अपने चचेरे भाई को यह कहते हुए ताने मार रही थी कि कितने की बोली लगी  आपकी भैया जी?लड़की वालों की नजर में आप की कितनी कीमत है कितने में आपको खरीदना पसंद किया? और ये बात मैंने लड़की वालों के सामने बोली जिसके चलते रिश्ता ही नहीं जुड़ सका|और मुझे बहुत ही डांट पड़ी|मैंने कहा बिकना तो सभी लड़कों को हैं एकदिन, बोलीं तो सबकी लगेगी|तो मेरी बहन बोलती है कि तुम्हारे इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है ये मत सोचों कि अभी कोई सामने से आके कहेगा कि मैं मेरी बोली नहीं लगेगी|सभी लोग पता नहीं क्या क्या मुझे बोले जा रहे थे| खैर ये तो एक सपना मात्र था पर हकीकत में लोग मेरी इन्हीं आदतों के कारण मुझे अक्खड़,जिद्दी और पता नहीं क्या क्या कहते हैं| ये लेख मैनें लिख तो बहुत पहले रखा था पर सपने की वजह से ही मैने ये लेख आज ही सबके बीच साझा करना चाहा वैसे अभी नहीं करने वाली थी|
दहेज लेना व देना कानूनी रूप से अपराध है| ये बात हर एक को पता है, लेकिन हकीकत देखकर लगता है कि हमारे यहां कानून तोड़ने के लिए ही बनाए जाते हैं|जिस तरह धड़ल्ले से सारे कानून की धज्जियां उड़ाई जाती हैं,उसे देखकर तो यही लगता है|कानून के रखवाले जिन्हें कानून (संविधान)के नियमों की रक्षा के लिए तैनात किया जाता है,पर कानून के रखवाले खुद बहुत से कानून तोड़ने के बाद कानून के रखवाले बनते हैं|साफ शब्दों में कहे तो कानून के रक्षक बनने के लिए पहले कानून के भछक बनते है|तो इनसे न्याय की क्या ही उम्मीद की जाए|दहेज जैसी कुप्रथाओं को कानून के भय पर दूर करना तो बहुत ही दूर की बात|जो खुद अपनी नौकरी का हवाला देते हुए दहेज मे बड़ी रकम की माग करते हैं| तो ऐसे में क्या ही आश लगाया जाए! दहेज प्रथा एक ऐसी कुप्रथा जिसके चलते अनेकों जिंदगियां तबाह हो गई हैं पर यह प्रथा ज्यों-कि-त्यों आज भी कायम है और वर्तमान में तो और भी विकराल रूप धारण कर चुकी है शहर की स्थिति तो मुझे ज्यादा अच्छे से नहीं पता पर अपने यहां की बात करूँ तो मुझे एक भी ऐसा व्यक्ति (पुरुषों में) नजर नहीं आता जो दहेज के खिलाफ हो, इस मामले में गरीब से लेकर अमीर सभी एक ही घाट के पानी है | पहले दहेज संपत्ति आदि को ध्यान में रखते हुए लिया जाता था पर आज डिग्रीयों और नौकरियों को ध्यान में रखते हुए लिया जाता है| सबसे अधिक तो विचलित करने वाली बात है की पढ़ी-लिखी युवा पीढ़ी भी दहेज लेना गलत नहीं समझती बल्कि अपनी शान समझती है, वैसे चाहे कितनी भी आधुनिक सोच रखें पर दहेज के मामले में रूढ़िवादी विचारधारा ही रखती है| और अपने पूर्वजों के पद चिन्हों पर चलना ही पसंद करती है अपने दहेज की रकम इतनी शान से बताते हैं ये लोग जैसे आईएएस की रैंक| ऐसा लगता है आज इनका पैदा होना सफल हो गया|हमारे यहां लड़कों के लिए एक कहवत है कि "घी का लड्डू टेड़ा ही सही" मुझे लगता है घी का तात्पर्य यहां दहेज से मिलने वाली रकम से है क्योंकि लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों को मात दे सकती हैं पर दहेज लेने के क्षेत्र में नहीं| यही एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें लड़कियां लड़कों से पीछे रहतीं हैं|अपने अभिभावक को सब कुछ दिला सकती हैं पर दहेज़ नहीं| मेरी नज़र में वे सभी पढ़े लिखे लोग एक अनपढ़ गंवार से बदतर है जो पढ़े लिखे होने के बाद भी ऐसी चीजों को बढ़ावा देते हैं|धिक्कार है ऐसी पढ़ाई पर जो विचारों को विस्तार न दे सके, शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है व्यक्ति को जागरुक करना और मानवता को प्रभावित करने करने वाली हर चीज की विरोध करना! पर विडम्बनाा हैै कि पढ़े लिखे लोग जो अपने पढ़े लिखे होने का गलत फायदा उठाते हैं! डिग्रियाँ दिखाकर दहेज़ मागते हैं| धिक्कार है ऐसे लोगों पर! ये लोग कभी ये क्यों नहीं सोचते कि दहेज़ जैसी कुप्रथा के कारण कितनी लड़कियाँ खुद को बोझ महसूस करती हैं अपने अभिभावक के सर पर! न करें तो करया जाता है|कितनी लड़कियां हैं जो बड़ती उम्र के साथ आईने से दूरी बना लेती हैं क्योंकि आईने में उन्होंने अपने गुलाबी होते गाल नहीं बल्कि पिता का बैचेनियों से भरा चहरा बढ़ती चिताओं से फीका पड़ता चेहरा नज़र आता है| जिसकी वजह वो खुद को समझतीं हैं, पर दुर्भाग्यपूर्ण है कि ये  लड़कियांं भी मां बनने के बाद वरिष्ठ व्यक्ति होने पर अपने लड़के की शादी में दहेज की मांग करती हैं| उस लड़की के और उसकेेे परिवार वालों के बारे में एक बार भी नहीं सोचती  और ना ही अतीत याद आता है जिससे इनका दिल पिघल सके| और वही बाप जिसका अपनी बेटी के समय में दहेज देने के वक़्त जो चेेहरा उतरा-उतरा 40-45 की उम्र में 60-65 का लग रहा था वही दहेज़ मागते वक़्त 35-40 के युवा जैसा चमक चमकने लगता है|और तो और दहेज़ की मांग करते वक्त ये लोग अपनी बेटी की शादी में दिये गये दहेज़ को बड़े शान से बताते हुए जता देते हैं कि इससे कम में तो बात नहीं बनेगी|पर दहेज़ की रकम देते वक़्त जो तकलीफ़ हुई वो इन्हें याद आती जिससे दहेज़ मागते वक़्त थोड़ी शर्म आ सके|आये भी कैसे दहेज़ की भूख इन पर हावी जो होती है जिसके आगे इन्हें किसी की तकलीफ़ नज़र ही नहीं आती| जिस तरह भूखे शेर को पर शेर की मजबूरी होती है लेकिन इन लोगों की क्या मजबूरी होती है? क्यों इनकी संवेदनाएं मर जाती है? 

रविवार, जनवरी 02, 2022

शिक्षा का सही अर्थ तो समझना होगा हमें

दिल्ली अमर उजाला द्वारा प्रकाशित 02/01/2022
शिक्षा का सही अर्थ समझना उतना ही महत्वपूर्ण है , जितना की शिक्षित होना । लेकिन यह तभी संभव है , जब शिक्षा को सिर्फ नौकरी पाने के मकसद से ग्रहण न किया जाए , बल्कि शिक्षा को मैत्री , करुणा , प्रसन्नता और उपेक्षा के भाव को जागृत करने के लिए अर्जित किया जाए । यह भाव व्यक्ति में नैतिक शिक्षा से ही उत्पन्न होता है । नैतिक शिक्षा से ही व्यक्ति को शिक्षा का सही अर्थ पता चलता है । जब व्यक्ति को शिक्षा का सही अर्थ पता चलता है , तभी व्यक्ति में निष्काम की भावना उत्पन्न होती है , तभी व्यक्ति में पर सेवा की भावना जागृत होती है और जब यह भावना जागृत होती है तो समाज के सारे अनाचार और दुराचार स्वयं समाप्त हो जाते हैं । आंतरिक कलह से निजात मिल जाती है , जिससे एक सुखी और संपन्न समाज के निर्माण के साथ प्रगतिशील राष्ट्र का निर्माण होता है । बच्चों से प्यार , नारी जाति का सम्मान और हर किसी के साथ सभ्य व्यवहार करना नैतिक शिक्षा ही सिखाती है । शिक्षा का सही अर्थ समझाने के लिए नैतिक शिक्षा को प्रत्येक कक्षा में अनिवार्य करने की आवश्यकता है , ताकि किशोरावस्था में गलत राह पर जाने वाली युवा पीढ़ी को बचाया जा सके और उनका सही मार्गदर्शन हो सके । जिस तरह से आज के अधिकतर युवा शिक्षा का अर्थ सिर्फ और सिर्फ नौकरी ही समझ बैठे हैं और उन्होंने मान लिया है कि शिक्षा सफल तभी होगी , जब उन्हें नौकरी मिलेगी । यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है । जिस तरह आज के युवा अपनी सफलता की हवस को मिटाने की खातिर और अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए समाज के हितों को दरकिनार कर रहे हैं , यह बहुत ही चिंतनीय है । इस बात को ध्यान में रखते हुए उन्हें यह समझाना आवश्यक है कि शिक्षा में सफलता का अर्थ है व्यक्ति के अंदर करुणा , मैत्री और संवेदना का भाव उत्पन्न होना । अपने हितों के साथ समाज के कल्याण का भी ध्यान रखना , क्योंकि बिना समाज कल्याण के विकासशील देश की कल्पना तक नहीं की जा सकती है ।

गुरुवार, दिसंबर 30, 2021

ईश्वर ,अल्लाह और गॉड?

Manisha Goswami कहते हैं इस पूरे श्रृष्टि का निर्माण सर्वशक्तिमान ईश्वर ने किया है , तो हर इंसान का निर्माण भी उन्हीं ने किया है
तो जाहिर सी बात है मनुष्यों के अंदर होने वाली सारी गतिविधियां भी उन्हीं की देन है, तो फिर किसी की खतरनाक सोच और हैवानियत भी उनकी देन हैं. तो फिर कोई इंसान बुरा होता है तो हम उसे गलत क्यों   कहते हैं? क्योंकि उसकी खतरनाक सोच भगवान की देन है.और भगवान की कोई चीज गलत नहीं हो सकती.
कहते हैं भगवान की मर्जी के  बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता  तो फिर हत्या, हैवानियत, चोरी आदि भी उनकी मर्जी से होतें होगें? इससे उनका मनोरंजन होता होगा? तभी तो चुप चाप एक देखते रहते हैं, या फिर जिसे सब सर्वशक्तिशाली कहते हैं उसकी हकीकत कुछ और है?या तो वो सर्वशक्तिशाली नहीं  है? या तो अति निर्दयी है?और जब कोई गलत काम करता है तो ये भी भगवान की मर्जी से होता है तो फिर दोषी को सजा सुुुना  कर सुप्रीम कोर्ट भगवान के खिलाफ काम करती है. क्योंकि इंसान तो भगवान की कठपुतली है जो उनके इसरो पर नाचता रहता है. दोषी नेे उन्हीं के इसारे पर काम किया , तो फिर किसी की नजरों में वो गलत कैसे हो गया? कहते हैं भगवान के सारे काम सही  होतें हैं तो दोषी भी सही और सुप्रीम कोर्ट भी.जब दोनों सही है तो फिर सजा क््यों? क्योंकि ये भगवान ने उससे करवाये हैं तो असली गुनेहगार तो भगवान है.और हाँ भगवान, अल्लाह  और गॉड  शक्तिशाली हैं तो फिर इन मंदिर और मस्जिदों की रखवाली ये मामुली इंसान क्यों करता है?  क्या भगवान इतने आलसी हैं कि अपने घर की रक्षा खुद नही कर सकते? 
उस समय  भगवान , अल्लाह और गॉड कहाँ चले जाते हैं? जब कोई ढोगी उनके नाम से लोगों को लूट रहा होता है और उनके ही दरबार में किसी के जिस्म से अपनी प्यास बुझाता है. क्या इतने बेशर्म और निर्दयी होतें हैं भगवान? तो फिर इनकी पूजा क्यों करते हैं लोग?
 
कहाँ चले जाते हैं  प्रेमियों के मार्गदर्शक सांवरिया कृष्ण उस वक्त जब कोई व्यक्ति प्यार के नाम पर किसी मासूम के जिस्म को अपना निसाना बना रहा होता है और अपने जिस्म की प्यास बुझा रहा होता है?कहते हैं इंद्र देव का मिज़ाज रंगीन था ! एक बार इंद्र धरती पर अपनी पत्नी इंद्राणी के साथ आये थे, और इंद्राणी को प्यास लगी वे इंद्राणी को वहीं बिठा कर एक गाँव में गए उंहें गाँव में एक खूबसूरत कन्या (उदंती ,जो वर्तमान में छत्तीसगढ़ में उदंती- सीतानदी रिज़र्व के रूप में स्थित है) को देख कर उनका मन मचल जाता है और उस पर मोहित हो गए ! और उन्हें इंद्राणी का खयाल ही नहीं रहा! तो आप लोग बताइये कि क्या ऐसे चरित्रहीन व्यक्ति को पूजना चाहिए ?जिसे पतिधर्म का पालन करना भी नहीं आता है.
ये विचार भी उन्हीं की देेन है ?क्योंकि पूरे श्रृष्टि का निर्माण उन्हीं ने तो किया है.ईश्वर तो सर्वशक्तिशाली है तो फिर क्यों नहीं अपने शक्ति से इनके मन को स्वच्छ् कर देते? क्या इस लिए नहीं करते कि इससे उनका मनोरंजन
होता है? या तो भगवान अति कमजोर है या फिर भगवान सिर्फ भर्म है ?कहते हैं कि शिवलिंग पर चढ़ाया गया गंगा जल को जिस जगह पर डाल देते हैं वो जगह  पवित्र हो जाती है और अपवित्र इंसान को भी पवित्र करने की क्षमता रखता है तो फिर मासिक धर्म के वक्त महिला के छूने भर से ये अपवित्र कैसे हो जाते हैं?
क्या कोई आस्तिक है जो भगवान की पूजा निस्वार्थ भाव से करता है या भगवान को बिना किसी अपेक्षा के मानता है? सब भगवान को सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए मानते हैं और पूजा करते हैं अगर बिना अपेक्षा के करते हैं तो उसमें भी स्वार्थ छुपा होता है क्योंकि पूजा करने से खुशी और शांति मिलती है तो हुआ न स्वार्थ! 
 है कोई भगवान और अल्लाह, गॉड का सच्चा भक्त जो इन सवालों का उत्तर दे सकता है??????????????????????????????????? 
                                 काश! 
काश!मंदिरों में छप्पन भोग लगाने की बजाय, भूखे को भोजन खिलाने की पंरपरा होती !
तो मंदिर की चौखट पर भूखे बच्चे नज़र  ना आते! 
काश! पीर बाबा पर चद्दर चढ़ाने के बजाय 
जरूरतमंद को वस्त्र भेट करने की पंरपरा होती,
तो ठंडी से ठिठुर कर किसी की मौत ना होती!
काश !भागवत-भंडारा कराने के बजाय गरीब बच्चों 
के सपने पूरे कराने की पंरपरा होती तो किसी के सपनें जिंदा दफ़न नहीं होतें 
काश! मंदिर ,मस्जिद बनाने के बजाय बेघरों के सर पे छत देने की पंरपरा होती तो कोई बेघर ना होता! 
काश !लोग धर्मवाद,जातिवाद करने के बजाय, मानवतावादी होतें,तो आज धर्म के नाम पर अधर्म नहीं हो रहें होते!               - मनीषा गोस्वामी
           
                                                                    
                       

अनुराग

  यूं तो मुझसे छोटा है उम्र में,  पर लगता है हम उम्र-सा। मासूम है छोटे बच्चे-सा। मासूमियत झलकती है,  उसके हर इक बात में। गलती से...