शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

वो जिस्म बेचती है तो वो बाजारू कहलायी लेकिन जिस्म को खरीदने वाले.....?

पता है मुझे बहुतों को मेरा ये लेख आपत्तिजनक और  अश्लीलता से भरा हुआ लगेगा ! रास नहीं आयेगा शीर्षक देखकर ही अनदेखा कर देंगे ! लेकिन इससे हकीकत नहीं बदल जाता! 
वैश्या बदचलन और चरित्रहीन तो है ही इस लिए तो समाज का तिरस्कार और समाज द्वारा दिये गये अनेक नाम के साथ खमोशी के साथ जीती  है! पर क्या कोई औरत जन्म से ही वैश्या होती ?क्या वो पैदाइशी चरित्रहीन होती है ? क्या उसके माथे पे लगे वैश्या के ठप्पे में सिर्फ़ उसका अकेले का हाथ होता है ? हाँ वो जिस्म बेचती है वो चरित्रहीन ! उसकी अपनी कोई इज्जत नहीं! पर उनका क्या जो उसे चरित्रहीन बनाते? जो इसके जिस्म को अपनी हवस की प्यास को बुझाने के लिए खरीदते हैं और उसके माथे पर वैश्या का ठप्पा लगाते हैं? रात के अंधेरे में रातेरंगीन करने जाने वाले शरीफजादे और नवाबजादो को क्यों नहीं कोई नाम दिया गया ? क्या इसलिए कि ये लोग छुप कर करते हैं? और
वैश्या डंके की चोट पर अपने जिस्म का व्यापार करती है तभी तो पूरी दुनिया का तिरस्कार सहती है! 
पर उन चरित्रवान पुरुषो का क्या जो अपनी पत्नी, अपने परिवार की नजरो से बचकर अपने हवस की प्यास बुझाने बदनाम गलियों में जाते हैं ? क्या ये लोग चरित्रहीन नहीं होते? ये लोग तो चरित्रहीन होने के साथ धोखेबाज़ और विश्वासघाती भी होते हैं । वैश्या फिर भी धोखेबाज नहीं होती।वो अपने जिस्म व्यापार करती है पर किसी की भावनाओं के साथ विश्वासघात नहीं करती । 
अगर वो पैसों की भूखी रहती है, तो ये समाज के ठेकेदार भी तो जिस्म के भूखे होतें हैं! 
जिस बदनाम गलियों को सुबह के उजाले में तिरस्कार भरी नजरों से देखते , रात होते ही उसी बदनाम गलियों में अपनी रातें रंगीन करते हैं !वो अपना जिस्म बेचती है,तो ये भी तो अपना ईमान बेचते हैं! तो फिर उसे ही अकेले हमेशा अपमानित क्यों किया जाता है? 
वैश्या अति सस्कारी और चरित्रवान पुरुषों की हवस  को छिपाने वाली वो लिबास है जिसके उतरते ही ये पुरुष ,समाज के सामने इस तरह निवस्त्र होगें कि फिर वस्त्र धारण करने के काबिल ही नही रह जाएगें! मुहं छिपाने की जगह नहीं मिलेगी! 
और चरित्रवान होने का ढोंग करने वालों का घमण्ड और परिवार एक साथ इस तरह टूटेगा कि फिर उसे दुनिया के सबसे काबिल  कारीगर भी नहीं जोड़ पायेगें! 
और अगर सभी लोग इतने ही चरित्रवान हैं तो फिर इन वैश्याओं का धन्धा आज भी कैसे चल रहा है ?ये रइसजादे जो बात बात पर  खुद को अच्छे , शरीफ़ खानदान का होने की अकड़ दिखाते रहतें हैं ,तो रातों को जिस्मों को खरीदने का हुजूम किसका लागता है? आखिर कौन है जो उन बदनाम गलियों में जाता है? क्या वो गरीब, जो दो वक्त की रोटी के लिए पूरे दिन मेहनत करता है लेकिन रात को पैसे इकट्ठा होते ही अपने जिस्म की भूख मिटाने चला जाता है? लेकिन ये भी सच है कि सभी अमीर  जिस्म के खरीददार नहीं होते पर जिस्म की कीमत लगाने वाले सभी अमीर ही होते हैं! 
और जिन गरीब और मध्यवर्गीय हवस के शिकारियों की पहुँच से ये कोठा बाहर होता है वे हवस को मिटाने के लिए बलात्कारी बन जाते हैं !  शुक्रगुज़ार होना चाहिए वैश्याओं का , कि वैश्यावृत्ति की बदोलत रइसजादे बलात्कारी बनते ,नहीं तो न्याय की कल्पना करना भी गुनाह हो जाता! 
 ये सच है कि इस समाज के नज़र में वैश्या की कोई इज्जत और औकात नही क्योंकि ये इसी की हकदार हैं! लेकिन ये बात भी नही भूलनी चाहिए कि इन्हें वैश्या बनाने वाले इस समाज के लोग ही हैं! और ये बात भी याद रखनी चाहिए कि वैश्या की नजरों में नोटों से घिरे नवाबों और चरित्रवान होने का ढोंग करने वालो की कोई औकात नहीं होती!  तो क्या कोई मुझे बता सकता है कि कौन अधिक गिरा हुआ इंसान है वो जो सबकी नजरों में गिरा हुआ है या फिर वो जो, सबकी नजरों में गिर चुके इंसान की नजरों में गिरा हुआ है? 
वैश्या अपने पेट की आग बुझाने के लिए अपने जिस्म को बेचती है और ये चरित्रवान लोग अपने हवस की भूख मिटाने के लिए अपने ईमान को जिस्म के हाथों बेच देते है !  जब निवस्त्र दोनों होतें हैं ,तो फिर एक पर ही क्यों कलंक का ठप्पा लगता है? किसी एक को ही क्यों वैश्या का नाम मिलता है? 
जिस्म को करके हवस के पुजारियों के हवाले, 
खड़ी हो जाती है , 
एक कोने में जाके! 
स्तब्ध सी निहारती रहती है , 
जिस्म को नोच रहें गिद्धों को, 
और इक वैश्या के आगे बेनकाब होती शराफत को! 
नोट-  आलोचनात्मक टिप्पणी करने की पूरी स्वतंत्रता है! पर शब्दों की सीमा का ध्यान रखें! 

रविवार, 18 जुलाई 2021

काले मेघ

कच्ची माटी के गाँव में , 
जब काले-काले मेघ आते हैं, 
कृषक  के मन में उम्मीदों का दिया जलाते है । 
जब रंग - बिरंगी फसलों पर, 
काली घटा छा जाती है। 
फिर रंग - बिरंगे दानों में, 
मोती सी चमक आ जाती है 
कच्ची माटी के गाँव में, 
जब काले- काले मेघ आते है। 
सूरज की आग से झुलस चुके 
चरागाहों को फिर से हरा भरा कर जाते है
गीली माटी का ठण्डा पन , 
हवा के झोंको में भर जाते हैं
कच्ची माटी के गाँव में जब 
निखरे - निखरे मौसम -आते हैं
गीली माटी की सोंधी खुशबू से 
घर आँगन महका जाते हैं! 
मीठी हरियाली की खुशबू, 
मंद हवाओ संग सुनहरी किरणों के साथ
हर दरवाजे़ पर दस्तक दे जाती है । 
सुबह ओस से गीले खेतों को, 
सुनहरी किरणें जब स्पर्श करती है , 
किसानो के लबों पे , 
मोती सी मुस्कान बिखेर जाती है । 
कच्ची माटी के गाँव में , 
काले मेघ अपने संग खुशियाँ लाते हैं! 

शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

जितनी तकलीफ़ सपने अधूरें रह जाने पर होती है, उतनी खुशी पूरा होने पर क्यों नहीं मिलती?

मेरी रचना "जिंदगी की शाम" जिसको अमर उजाला की सप्ताहिक पत्रिका रुपायन में 14 मई  को प्रकाशित किया गया । जिसे अगर आप देखना चाहते हैं तो लेबल-  अकेलापन पर क्लिक करके देख सकते हैं! 
प्रकाशित हुए तो महीनों हो गयें पर मुझे जानकारी अभी  हाल ही में मिली क्योंकि उस वक्त अखबार वाले चाचा जी बिमार थे इसलिए अखबार नहीं आ पा रहा था और जिस फोन से मैंने रचना को प्रकाशित करने के लिए ई -मेल किया था वो फोन भी खराब था! 
खैर,  
अब मुद्दे पर आते हैं, मेरा मकसद आप लोगो को ये बताने का नहीं कि मेरी रचना प्रकाशित की गई,  बल्कि मेरे मन  में उठ रहे कुछ सवालों का जवाब ढूढ़ना है! जब मैंने अपनी रचना को प्रकाशित करने के लिए  भेजा था, तब मैं बहुत उत्साहित और खुश थी, ये बात सोच कर  कि जिस दिन मेरी रचना रूपायन में प्रकाशित होगी उस दिन  उन लोगों का मुंह बंद हो जाएगा जो मेरे हुनर का मजाक उड़ाते हैं , और जब मेरे दादा जी मेरी फोटो के साथ मेरी रचना को रूपायन में देखेंगे तो बहुत खुश होगें! (ये रचना मैंने अपने दादा जी पर ही लिखी है) 
हर शुक्रवार का मैं बेसब्री से इंतज़ार करती रहती थी ! और पत्रिका उठा कर देखती , मेरी कविता प्रकाशित न होने पर मैं बहुत ही निराश हो जाती थी, क्योंकि दिसम्बर से मैं प्रकाशित कराने के लिए कोशिश कर रही थी! मेरे लिए सपने जैसा हो गया था प्रकाशन कराना! ऐसा लगता था कि वो दिन बहुत ही खूबसूरत होगा मेरे लिए जिस दिन मेरी रचना को रूपायन में जगह मिलेगी! किन्तु अब जब प्रकाशित हो चुकी  है,तो मुझे कुछ खास खुशी नहीं मिली, उतनी भी नहीं जितनी प्रकाशित न होने पर निराशा  और तकलीफ़ मिलती थी! 
ऐसा क्यों होता है कि जितना सपने के सच होने के बारे में सोच कर खुशी मिलती है, उतनी खुशी सच होने पर नहीं मिलती? 
मैं मानती हूँ ये बहुत बढ़ी उपाधि नहीं है पर ये भी सच है कि मेरी उम्र के जितने लोग मेरे पहचान के हैं उनसे तुलना करें तो इतनी छोटी भी नहीं है! 
किन्तु जब ये ख्वाहिश अधुरी थी, तो बहुत ही बड़ी बात लगती थी, ऐसा क्यों होता है, कि जब सपने या ख्वाहिशें अधूरी रह जाती हैं तो बहुत बड़ी बात और  महत्वपूर्ण लगती हैं ,और उसके लिए किये गए प्रयास बहुत ही अधिक लगते हैं पर जब पूरी हो जाती हैं तो सारे प्रयास बहुत ही कम लगते हैं? और अब मुझे ऐसा लगता है कि उस दिन मुझे असली खुशी मिलेगी जिस दिन मेरी पुस्तक प्रकाशित होगी! मुझे ऐसा क्यों लगता है कि जितनी खुशी खुली आँखों से सपने देखने मिलती है   उतनी खुशी सच होने पर नहीं मिलती? जीतने के बाद, जीत के लिए किये गए सारे संघर्ष  हम कुछ ही दिनों में भूल जाते हैं,और वही जब सपना अधूरा रह जाता है तो खुशी की तुलना में कहीं अधिक तकलीफ़ मिलती है जो महीनों तो कभी कभी सालों तक बरकरार रहती है क्यों? फिर सपना छोटा हो या बड़ा, हार छोटी हो या बड़ी! 
ऐसा क्यों होता है? 


सोमवार, 12 जुलाई 2021

क्यों नहीं मिलती खुशी किसी को ईसानियत का फर्ज़ अदा कर?

कड़वा सत्य! 
कोई शांति के लिए भगवान को पूजता है , 
तो किसी को मिल जाती है खुशी, पत्थर पूज कर ! 
क्यों नहीं मिलती खुशी किसी को ईसानियत का फर्ज़ अदा कर?
भूखे बच्चों को नजरअंदाज करके , 
पत्थर की मूर्ति को छप्पन भोग लगाया जाता है,  
पत्थर की मूर्ति को सोने के पलने में सुलाया जाता है । 
और बे घर लोगों को फुटपाथ पर, 
खुले असामान के नीचे सोने के लिए छोड़ दिया जाता है!
पत्थर की मूर्ति के आगे दिन में भी घी के दीपक का प्रकाश है, 
पर झुग्गी - झोपड़ियों में आज भी अधियारे का राज है।
मंदिर मे करोड़ों दान कर दिया जाता है ,
पर एक गरीब से पैसे, 
सूत ब्याज सहित वापस ले लिया जाता है ! 
एक ढोंगी भगवा धारी को अतिथि कक्ष में ठहराया जाता है , 
वहीं एक बे सहारा को नौकर बना लिया जाता है।
इसिलिए तो आस्था के नाम पर हो रहा विश्वासघात है ! 
यहाँ पत्थर की नारी को सिर झुकाया जाता है , 
और जीवित नारी का प्रतिदिन चीरहरण किया जाता है! 
पत्थर की मूर्ति के खातिर इंसान,
इंसानियत का हत्यारा बन जाता है , 
मंदिर, मस्जिद, हिन्दू ,मुस्लिम के चक्कर में, 
इंसानियत का धर्म भूल जाता है ! 
मुझे आपत्ति नहीं किसी के पूजा और पाठ से ,
आपत्ति तो बस अंधविश्वास से । 
मानवता से बड़ कर मेरे लिए कोई धर्म नहीं ! 

शनिवार, 26 जून 2021

अपनो से जीतना नहीं , अपनो को जीतना है मुझे!

देखती हूँ जब भी एक पिता का उतरा हुआ चेहरा, 
लड़की होने पर अफ़सोस होता है मुझे ! 
सोचती है काश लड़का होती, 
और एक बाप के सिर का बोझ न होकर ,सहारा होती, 
लड़की होना गुनाह नहीं पता है मुझे । 
पर दहेज रूपी दानव के कारण एक पिता के सिर का बोझ हूँ मैं , 
महसूस कर सकूँ उसके दर्द को 
अभी इतनी काबिल नहीं मैं।
सपनो के खातिर नहीं लड़ सकती अपनो से , 
क्योंकि अपनो से जीतना नहीं , अपनो को जीतना है मुझे! 
देख कर एक बाप को अपनी छोटी छोटी ख्वाहिशों के समझौता करते हुए
ख्वाहिश बन रह जातीं हैं इच्छाएँ मेरी ,
छुपाती रहती उसकी नज़रो से खुद को , 
कि लड़की रूपी बोझ का एहसास ना हो उसको
मेरी बड़ती उम्र के साथ उसकी चिंताएँ बड़ रही है, 
पता है मुझे! 
सपने सच होने से पहले हाथ पीले हो जाएगें, 
पर ये पीले हाथ मेरे सपने सच होने से नहीं रोक पाएंगे! 
आज भले ही बोझ हूँ पर एक दिन पर दिन गर्व का कारण बनूंगी! 

शुक्रवार, 4 जून 2021

जिन्दगी की शाम


 कहने को उसका पूरा परिवार है,

फिर भी उसकी जिन्दगी विरान है!

परिवार रूपी बगीचे को लगाने वाला माली,

उसी बगीचे की छांव के लिये मोहताज है!

            ◦•●◉✿✿◉●•◦

जिन पौधों को प्रेम और स्नेह 

से सीच कर हरा भरा किया था,

उन्हीं के बीच खुद उदास बैठा आज है!

झुर्रीदार चेहरे में बैचेनिया छुपी हजार है,

पर इस बैचेनियो का किसी को नही एहसास है!

                   ◦•●◉✿✿◉●•◦

जिन्दगी की इस शाम में अकेला वो आज है!

जिससे परिवार रूपी बगीचे में आया बसन्त  है

उसी की जिन्दगी में पतझड़ लगा आज है!

जिन हाथो ने छोटी छोटी उंगलियों को 

पकड़ कर चलना सिखाया था,

उन्हीं उंगलियों को खुद पर उठता देख हैरान है!

                     ◦•●◉✿✿◉●•◦

होली के रंग तो उसके चेहरे पर लगे है, 

पर जिन्दगी में फीके खुशियों के रंग है!

पास होकर भी कोई नही उसके साथ है!

जो कंधे बच्चों को पूरे मेेेले की सैैैर कराया करते थे,

उन्हीं की जिन्दगी एक काठ की छड़ी पर टिकी आज है!

                      ◦•●◉✿✿◉●•◦

जिन्दगी के इस सफर में आकेला आज है,

बच्चों की तरह वो खुद से करता रहता संवाद है!

फिर भी अपने बच्चों की 

खुशियों के लिए हर पल करता फरियाद है!

आखिर वो इक बाप है! 

सोमवार, 31 मई 2021

सिर्फ सोशलमीडिया पर ही नहीं जम़ीन पर भी पेड़ लगाएं इस पर्यावरण दिवस पर

बात 𝟮𝟬𝟭𝟵 की है, जब मैनें शिक्षक दिवस पर शिक्षकों को तोहफ़े में पौधे दिये थे, मुझे पता था, कि हर कोई उसकी कीमत नहीं समझेगा ! इस लिए पौधे के साथ कुछ चीजे उपहार स्वरूप भेंट की थी! सभी शिक्षकों ने खुशी - खुशी मेरे तोहफ़े को स्वीकार कर लिया और मेरे भौतिक विज्ञान के सर बोले इससे बेहतर उपहार कुछ और हो ही नही सकता ! तारीफ़ का पुल ही बांध दिया था उन्होंने ! मैं बहुत खुश हुई, क्योंकि मुझे पता बहुत लोग मेरा मज़ाक बनाएंगे पर सर की तारीफ़ के बाद सब के मुहं बंद थे! जब मैंने ये तोहफ़े दिये थे तब मैं वहाँ की पढ़ाई पूरी कर चुकी थी इसलिए बाद में मुझे मेरी बहन से पता चला कि जो सर मेरी तारीफ़ के पुल बांध रहें थे ,वो पौधें को अपने घर ले जाने में शर्म महसूस कर रहे थे, इसलिए पौधें को स्कूल में ही छोड़ दिया! ये सुन कर मुझे दु:ख तो बहुत हुआ और उससे भी ज्यादा सर पर गुस्सा आया!  सर को लगा होगा कि बड़ी बड़ी बातें करना भी तो प्रकृति से प्यार है!पर सिर्फ बड़ी बड़ी बात करने और अच्छे लेख ,कविता लिखने या सोशलमीडिया पर अच्छी-अच्छी पर्यावरण दिवस की पोस्ट डालने से पर्यावरण स्वच्छ नहीं होने वाला ये बात हम सब को समझनी चाहिए! जितनी अच्छी पोस्ट और बातें हो कम से कम उतने ही अच्छे जमीन पर काम होना चाहिए हमारा ! तभी पर्यावरण शुद्ध और स्वच्छ होगा! आये दिन लोग स्टेट्स डालते रहते हैं कि सांसें हो रहीं कम,आओ पेड़ लगाएं हम, सोशलमीडिया पर नहीं जमीन पर पेड़ लगाना जरूरी है सिर्फ सोशलमीडिया पर लगाने कुछ नहीं होने वाला! प्रकृति हमारी सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण धरोहर है, जिसे समहाल कर रखना हमारी जिम्मेदारी है ,जिस तरह से हमारे पूर्वजों ने हमारी प्रकृति को स्वच्छ और सुंदर बना कर हमें एक बहुत ही कीमती धरोहर के रूप में दिया वैसे ही हमारी भी जिम्मेदारी है ,कि हम आने वाली पीढ़ी को एक स्वच्छ और सुंदर वातावरण भेंट स्वरुप दें । 
जिससे उनका जीवन सुखदायक हो । यदि हम ऐसा नहीं कर पाते है, तो हमें नई पीढ़ी को भी जन्म नहीं देना चाहिए ! जब उनके पास सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा और पीने के लिए स्वच्छ पानी खाने के लिए स्वच्छ भोजन नही रहेगा तो जीवन यापन कैसे करेगें❓कितने दिन तक वो ऑक्सीजन सिलेंडर और फिल्टर पानी से जी सकेगे❓चलो मान लेती हूँ मानव जाति स्वच्छ पानी , स्वच्छ हवा और स्वच्छ भोजन के लिए कोई यंत्र बना लेगा जिससे सब रखच्छ हो जाएगा ,लेकिन पशु , पक्षियों और बाकी जीवों का क्या❓क्या बाकी जीव, जन्तु और वनस्पति के बिना मनुष्य का जीवन संभव है❓सच तो ये है कि बिना प्रकृति के जीवन की कल्पना करना मुर्खता है । बिना प्रकृति के जीवन असम्भव है । यह ऐसी समस्या है जिससे सिर्फ मानव जाति को ही नहीं बल्की समस्त प्राणी के लिए खतरा है ! ये बहुत ही चिन्ता का विषय! हमारी सरकार ने प्रकृति को बचाने के लिए कुछ योजना चला रखी है , जो काफी नहीं है । कठोर कदम उठाने की जरूरत है ।जैसा कि जुलाई महीनें को पौधारोपण महीनें के रूप मे मनाया जाता और लाखों पौधें लगाएं जाते हैं, पर अगले साल उनकी संख्या सिर्फ हजारों में ही रहती है । क्योंकि ग्राम प्रधान , सरकारी अधिकारी और अन्य लोग सरकार के दबाव में पौधा रोपण तो कर  देते हैं पर दुबारा उसकी खबर तक नहीं लेते! महाशय को इतनी फुर्सत कहाँ! कुछ तो और भी महान प्राणी हैं जो पौधारोपण करवाते ही नहीं पर सरकारी कागज़ात पर वृक्षारोपण हो जाता है ! इस लिए सिर्फ बड़े बड़े अभियान चलाना काफ़ी नहीं है !उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है ,कि अभियान छोटा ही क्यों ना हो पर उसकी पूरी निगरानी होनी चाहिए!  और सरकार को चाहिए कि वृक्षारोपण अभियान को सफल बनाने के लिए  हर ग्राम पंचायत, हर नगरपालिका मोहल्ले में ऐसे लोगो का समूह तैयार करें , जो पौधे की देखदख करें , जो पैसे के लिए नहीं , सिर्फ पर्यावरण के लिए काम करे जो प्रकृति प्रेमी हो और तनख्वाह के तौर पर एक साल पूरे हो जाने के बाद पुरस्कार देना चाहिए वो भी तब ,जब 60% से अधिक पौधें को बचाने में सफल रहतें हैं तो ,ऐसे ही  प्रतिशत के हिसाब से पुरस्कारों की कीमत अलग - अलग होनी चाहिए! अधिक प्रतिशत वाले को अधिक कीमती पुरस्कार देना चाहिए! मुझे लगता है इसमें सिर्फ वही लोग भाग लेगें जो सच में प्रकृति प्रेमी हैं! क्योंकि इसमें तनख्वाह नहीं मिलेगा! प्रकृति को बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है सिर्फ सरकार की नहीं ! 

गुरुवार, 27 मई 2021

अब इस अनोमल जिंदगी को यूँ ही नहीं गवाना

                     क्या कसूर है हमारा ? 
             क्यों कैद भरी जिंदगी जीने पर 
               मजबू़र कर रहा ये जमाना ? 
                   बता दे हमे ऐ जमाना ? 
         क्या लड़कियाँ नहीं जीत सकती जंग ?
                   भूल गए क्या वो अतीत ?
                झाँसी की मर्दानी की जीत ! 
                      कहाँ की है ये रीत ?
             कि लड़कियों को रखो घरों में कैद, 
                       किसने बनाई ये रीत ? 
                यदि तुम लोगों की यही है नीत, 
                तो अब तुम्हारी हार है नजदीक |
            अब कान खोल कर सुन ले ऐ जमाना |
                       इन चार दिवारियों को, 
                     तोड़ने का हमने है ठाना |
           अब नहीं रोक सकता हमे ऐ जमाना |
            अभी तक हमने तुम्हारा कहना माना , 
               तुम्हारें हर जुर्म को सहना चाहा , 
                पर अब इस अनोमल जिंदगी को
                         यूँ ही नहीं गवाना | 
               किसी भी लड़की की ख्वाहिशों को 
                    नहीं दफना सकता ऐ जमाना!
                     सदियों से दबी है जो आवाज़ , 
             उसे ज्वालामुखी के रुप मे है बाहर लाना |
                  अब इस जमाने को धूल है चटाना |
                  कलम को है अपनी ताकत बनाना |
                             जिंदगी जीने का  

                   असली मकसद अब है जाना |


सोमवार, 24 मई 2021

दास्ताँ-ए-गाँव

 मैं आज आप लोगो को अपने गाँव की कुछ रूढ़िवादी विचारधाराओं से रूबरू करवाती हूँ  ! हमारे गाँव में आज भी कुछ ऐसे बुद्धिजीवी लोग है जिनका मानना है कि महिलाएँ ज्यादा पढ़- लिख लेती हैं तो उनका दिमाग खराब हो जाता है वे हमारे यहाँ की परंपरा , रीत -रिवाजों , और संस्कारों को भूल जाती है । अपने पैर पर खड़े होते ही अपने से बडो़ की इज्ज़त करना भूल जाती है दरअसल इन बुद्धिजीवियों की समस्या ये है, इनको लगता है, कि जो ये कहते है और जो करते है सिर्फ वही सही है । यदि कोई औरत इनके विचारों पर अपने विचार रखती है तो इन को उसमें अपना अपमान नज़र आता है । इसलिए इन लोगो को स्याही वाले हाथ की उम्र में मेहंदी वाले हाथ भाते है कानून ने भले ही महिलाओं को हर क्षेत्र में जाने अधिकार दे रखा है पर  हमारे यहाँ घर वाले और  गाँव वाले ने सिर्फ मेडिकल, टीचिंग, पुलिस ,बैकिंग के ही क्षेत्रों में जाने का अधिकार दिया है! मैं आप लोगो को आज अपने गाँव की चाची जी के बारे में बताती हूँ जिनकी उम्र लगभग 40 के आस - पास है  जो पहले गाँव में दिहाड़ी मजदूरी करती थी पर दो, तीन साल से एक सरकारी अस्पताल में काम करती है बस इसी बात से गाँव के लोगों के निशान पर रहती है मौका पाते ही कुछ लोग उनके  चरित्र पर उंगली उठाने से नहीं चूकते  हैं । और कहते है , "यैं रात रात भर अस्पताल मा रहत हीं इनके घरे खाना खाय वाला नाय है, पता नाय कतने जन से मुंह काला करावत हीं, ई मिहारू पूरे गाँव कैय नाक कटाय कैय तब दम ली! इन लोगों को गाँव की चिंता तब नही सताती जब एक औरत रात के दो बजे ही खेतों मे मर्दों के बीच काम करती है और तब भी जब तेज़ दोपहरी में काम करते करते पसीने में भीगने के कारण सारे कपडे़ बदन से चिपक जाते हैं जिससे खेत मे काम कर रहे लोगो के फूहड़ मजाक का सामना करना पड़ता है जब बोझा उठाते वक्त पल्लू को गिरने के कारण गंदी नजरों का शिकार होती है ! तब इन बुद्धिजीवियों को गााँव के इज्जत के साथ खिलवाड़ होता हुआ नज़र नहीं आता और अनहोनी की बू नहीं आती ! लेकिन जब  एक औरत 7-8 किमी की दूरी पर एक अस्पताल मे काम करने जाने लगी तो ये बात गले नहीं उतर रही है और  ये समाज उनके गलत हो जाने के डर से पतला होता जा रहा है  ! कुछ महान लोगो ने तो उनसे सारे रिश्ते तोड़ लिए उनके यहाँ का पानी भी नहीं पीते हैं । क्योंकि वो रात के नौ - दस बजे काम से वापस आतीं हैं जो इनकी नजर मे गलत है हमारे  यहाँ  किसी की बेटी भाग जाती है तो उसकी सजा मां - बाप को मिलती है सजा के तौर पर उन्हें समाज से अलग कर दिया जाता है उनके यहाँ  पानी तक नहीं पीते है . क्योंकि लोगों को लगता है कि यदि कोई उसके घर खाना खाता है या पानी पीता है सारा पाप उसके सर पर आ जाता है लेकिन यदि कोई पुरुष एक पत्नी के रहते हुए दूूसरी औरत ले कर आ जाए जो उनसे नीची जाति की ना हो ( दरअसल हमारे यहाँ आज भी ऊँच नीच का भेद भाव कायम है) तो बिना कोई सवाल किए सारे लोग स्वीकार कर लेते है । जब यही काम कोई महिला करती है तो उसे समाज से अलग कर दिया जाता है मुझे समझ नहीं आता जो काम महिलाओं के लिए गलत है वो पुरुषों के लिए सही  कैसे हो जाता है ? क्या काम का भी जेंडर होता है ? जो चीज गलत है मतलब गलत है वो किसी एक के लिए सही कैसे हो सकती है ?ये तो वही बात हुई तुम करो तो रासलीला और हम करे तो कैरेक्टर ढीला!  जो काम गलत है वो हर किसी कर लिए गलत होता है किसी एक के लिए सही नहीं हो सकता!  क्योंकि सत्यनारायण की कथा कहने वाले पंडित जी यदि मंत्र की जगह अगर गाली देते हैं तो वो मंत्र नहीं हो जाती !गाली ही रहती । या मस्जिद मे कुरान पढ़ने वाले मौलवी नवाज़ की जगह अशब्द का इस्तेमाल करे तो वो शब्द पाक नहीं हो जाता वो अशब्द  ही रहता है ठीक उसी तरह गलत काम गलत ही रहता है फिर करने वाला चाहे कोई भी हो । हमारे यहाँ आज भी महिलाएं साड़ी के सिवा कुछ और नहीं पहन सकती । क्योंकि ऐसा करने पर हास्य , तंज भरी निगाहों  और व्यंग्य के चुभते बाड़ों का सामना करना पड़ता है लेकिन पुरुषों के साथ ऐसा  कुछ भी नहीं होता , वे तो बहुत पहले ही ' आधुनिक हो चुकें है बड़े - बूढ़े भी पैंट -शर्ट और वरमूडा पहनते है लेकिन महिलाएँ अगर सलवार -कुर्ता भी पहन ले तो इन्हे रास नहीं आता  है लेकिन साड़ी में आधा बदन भी दिखे तो भी स्वीकार है । यहाँ महिलाओं के लिए बदलाव कछुआ की तरह रेेंगते हुुए आता है पर पुरुषों के लिए चीते की रफ्तार से! यहाँ यदि 14 साल का लड़का बुलेट जैसी  वजनदार बाइक पर फर्राटे भरता तो समाज ,कानून किसी के भी कान पर जूं तक नहीं रेंगती लेकिन जब एक 40 साल की महिला खुद की कमाई से गाड़ी खरीद कर ड्राइविंग लाइसेंस साथ लेकर गाड़ी चलाए तो ये बात इनके गले नहीं उतरती उसके बिगड़ने की चिंता में समाज अवसाग्रस्त होता जाता है! जिसके चलते दिन प्रति दिन पतला होता जाता है! 

कुछ पंक्तियाँ हमारे समाज के महान लोगो के लिए-

इन नाजुक हाथों से 

जिस दिन कलम की तेज धार निकलेगी, 

जिस दिन रिश्तों का लिहाज़ किये बिना, 

खुल कर रूढ़िवादी विचारधारा पर प्रहार करेगी, 

शराफ़त की नकाब ओढ़ कर बैठे हैं, 

जितने शरीफ़जादे ,

उनके चेहरे बेनकाब करेगी! 


शनिवार, 22 मई 2021

ई- गोल्ड

हाल ही में  भारतीय सुरक्षा विनिमय बोर्ड के प्रमुख अजय त्यागी जी ने एक प्रस्ताव पेश किया है! जिसमें उन्होंने कहा कि अगर हम पूरे भारत में सोने के व्यापार को ई- गोल्ड के रूप करें  ( ई-  गोल्ड रीसिप्ट स्कीम) यानी कि  गोल्ड की जगह ई- गोल्ड के उपर कार्य करेंगे तो ज्यादा बेहतर होगा! जिसमें आप सोने को इलेक्ट्रॉनिक रूप में परिवर्तित सकते हैं! ये सुन कर अक्सर लोगों के मन में एक सवाल उठाता है कि सोने को इलेक्ट्रॉनिक रूप  में कैसे परिवर्तित हो सकता है? 

सोने को इलेक्ट्रॉनिक सोने में कैसे परिवर्तित करते है? 

तो इसके लिए हमें बैंक के पास जाना होगा और अपना सोना बैंक को देकर उसके बदले एक रसीद ले सकते हैं जिसकी कीमत सोने की वजन पर निर्भर होगी और वर्तमान के सोने के भाव जितनी होगी! ऐसा करने से ये फयदा होता है कि हम जितने भाव में सोने को सुनार की दुकान से खरीदें थे उतने भाव में ही बैंक को दे सकते हैं और वही जब हम दुकानों में बेचते हैं तो  सुनार कटौती कर लेता है लेकिन इसमें ऐसा कुछ नहीं है!  और इस रसीद को हम किसी को भी कभी भी सोने के भाव में बिना किसी  काटौती  के  बेच सकते हैं (जितना भाव बैंक में सोने को देते वक्त था) जिसको  बेचेगे वो व्यक्ति किसी दूसरी  बैंक से भी सोने को निकाल सकता है! और अगर आप बेचते नहीं हो तो आप जब चाहे अपने सोने को वापस ले सकते हैं! इससे फायदे ये  होगें कि आप सोने को बैंक के लॉकर में जमा कर के पैैसे देने की जगह आप बैंक को दे कर उससे आप एक रसीद ले सकते जिससे आपका सोना भी सुरक्षित रहेगा और आपका पैैैैसा भी आपके पास रहेेगा! जिस तरह हम बैकों में FD, RD करते हैं ये वैैैैसा ही है! 

ये सोब्रिन गोल्ड बॉण्ड स्कीम से अलग है क्योंकि इसमें सोने को ,सोन के रूप आप दुबारा वापस ले सकते हैं पर सोब्रिन गोल्ड बॉण्ड स्कीम में ऐसा नहीं कर सकते! पर इसमें उन लोगों का फायदा नही होने वाला जिन्होंने ने काले धन को पीला धन बना रखा है 😃😃😅😅 

 अगर इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाता है तो अच्छा रहेगा! बाकी हर सिक्के के दो पहलू होते हैं पर ये बात ज्यादा मायने रखती है कि कौन सा पहलू भारी खूबियों वाला या कमियों वाला! और इसमें खूबियों वाला पड़ला भारी नज़र आ रहा है फ्रॉड होने के भी नहीं हो सकता क्योंकि ये भारतीय सुरक्षा विनिमय बोर्ड की निगरानी में किया जाएगा और अगर हो भी जाता है तो उसकी पूरी जाच भारतीय सुरक्षा विनिमय बोर्ड द्वारा किया जाएगा जिससे पैसे डूबने का खतरा बहुत ही कम है! 



वो जिस्म बेचती है तो वो बाजारू कहलायी लेकिन जिस्म को खरीदने वाले.....?

पता है मुझे बहुतों को मेरा ये लेख आपत्तिजनक और  अश्लीलता से भरा हुआ लगेगा ! रास नहीं आयेगा शीर्षक देखकर ही अनदेखा कर देंगे ! लेक...