शुक्रवार, जनवरी 20, 2023

खेलने का फैसला करने से लेकर खेल के मैदान तक सफर

कुश्ती के अखाड़े में जिन शेर और शेरनियों को लड़ते हुए देखते थे उन्हें आज जंतर मंतर पर अपने स्वाभिमान,अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ना पड़ रहा है। इससे दुर्भाग्यपूर्ण और क्या होगा? जिनका एक एक पल बेशकीमती होता है वे आपना वक़्त अपनी प्रतिभा को देने के बजाय जंतर मंतर पर बर्बाद करने पर मजबूर हो रहें हैं। जिस लड़ाई की नौबत ही नहीं आनी चाहिए उसे लड़ते हुए तीन दिन हो गए और सत्ताधारी लोग मुंह में दही जमाये बैठे हैं।जिस महाशय पर आरोप लगा है उनके रंगीन मिज़ाज से सब वाकिफ़ हैं फिर भी मूकदर्शक बने बैठे हैं। सत्ता के नशे में इस तरह लीन रहते हैं कि  किसी को मंच पर ही थप्पड़ जड़ सकते हैं और सरेआम किसी की हत्या करने की बात कबूल सकते हैं।और पता नहीं कितनी लड़कियों का नजरों से बलात्कार कर चुके हैं।जो खुद को सांवरिया समझतें हैं। जिनके महाविद्यालय कुछ इस हर जगह खुले हैं जैसे कुकुर मुत्ता हर जगह उगा रहता है।शिक्षा व्यवस्था की पूरी धज्जी उड़ा कर रख दी है। पर इसकी जिम्मेदार आम जनता है क्योंकि आम जनता ने ही इन्हें सर पर चढ़ा रखा है। जहाँ आज सबको आगे आकर पहलवानों का साथ देना चाहिए और उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहिए तो हमारे गोण्डा के महान लोग उत्तर प्रदेश बनाम हरियाणा करने में लगे हैं। नेता जी हम आपके साथ है कह कर अपनी उच्च सोच का  प्रदर्शन कर रहें हैं। पर नेताओं के तलवे चाटने वाले भूल रहें हैं कि उनकी माँ-बहन और बेटी भी इसका शिकार हो सकती है या शायद हो चुकी भी हो पर चुप हो। और उन लड़कियों को तो इक्कीस तोपों की सलामी जो आज भी इस नरभक्षी की दिवानी बनी बैठीं है और सेल्फी लेने के लिए मरती रहतीं है। मुझे हैरानी होती है कि ये लड़कियाँ किसी के स्पर्श को महसूस कैसे नहीं कर पाती कि गंदे इरादों से स्पर्श कर रहा है, यहाँ गंदी नजरें भी महसूस कर ली जाती है कि कौन अपनी अश्लील नज़रों से निवस्त्र कर रहा है और कौन नहीं। लेकिन हमारे गोण्डा वाले बहुत महान है अपने परिवार के सदस्य(गोण्डा के निवासियों) की हर गलती और गुनाहों को मांफ कर देते हैं।और अपनी बहन और बेटियों की इज़्ज़त अपने प्रिय नेता जी के लिए दांव पर भी लगा देते हैं। अभी भी कुछ लोग इस हवस्खोर के साथ सेल्फी लेकर सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट करेंगे और ऐसा महसूस करेंगे जैसे कि साक्षात भगवान के दर्शन हो गयें हो। शुक्रगुज़ार होना चाहिए इन पहलवानों का कि वे हमारे और आपके हिस्से की लड़ाई लड़ रहे हैं और इस जिस्म के पुजारी से निजात दिलाना में एड़ी चोटी का जोर लगा रहें हैं। पर नहीं हम तो गोण्डा वाले है हम अपने गोण्डा के लोगों की अलोचना कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं।यही चमचागिरी हमें आगे बढ़ने नहीं दे रही, जिस लड़ाई की नौबत ही नहीं आनी चाहिए उसे लड़ते हुए तीन दिन हो गए और कुर्सी के लालची मुंह में दही जमाये बैठे हैं।पर ब्रिज भूषण को और उनके चमचों को उनकी पंसदीदा पंक्तियाँ याद रखनी चाहिए कि- सच है विपत जब आती है कायर को ही दहलाती है............सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते.........! हमारे सूरमा (पहलवान)भी विचलित होने वाले नहीं है इतनी आसानी से। कहते मानव जब जोर लगता पत्थर पानी बन जाता है, जब हमारे सूरमाओं ने जोर लगाया तो.....! हम दुआ करते हैं कि हमारे प्रिय सांसद जी की  रंगीन जिंदगी से ये वक़्त जल्द से जल्द गुजर जाए और इससे भी अधिक बुरा वक़्त आए। मासूमों की इज़्ज़त के साथ खेलने वाले की सराफत की नकाब कुछ इस तरह बेनकाब हो कि छुपाने के लिए कपड़े कम पड़ जाए । ऐसा पहली बार नहीं है जब हमारी महिला खिलाड़ियों के साथ ऐसा हुआ है ऐसे अनगिनत हवस्खोर हर क्षेत्र में उच्च पदों पर विराजमान हैं। इससे पहले हरियाणा के खेल मंत्री और पूर्व हॉकी कप्तान संदीप सिंह द्वारा हरियाणा में एक जूनियर महिला कोच पर यौन शोषण का आरोप लगाया गया, सच्चाई तो जांच के बाद पूरी तरह स्पष्ट होगी।लेकिन ये बात साफ हो गई है कि किस तरह प्रति दिन खेल जगत में महिलाओं के साथ खेल खेला जा रहा है और और यौन शोषण के आरोपों ने एक बार फिर खेल जगत में व्याप्त गंदगी को उजागर कर दिया है। इससे पहले भी खेल जगत से कई महिलाओं के साथ अभद्रता और छेड़छाड़ जैसी घटनाएं सामने आई हैं, लेकिन ये घटना ज्यादा हैरान करने वाली इसलिए है क्योंकि दोषी भारतीय हॉकी टीम का जाना-माना चेहरा है जिस पर सूरमा फिल्म भी बनी है।और इसी साल मई में एक महिला साइकिलिस्ट के साथ कोच द्वारा यौन उत्पीड़न और कोच के साथ कमरे में सोने का विरोध करने पर महिला साइकिलिस्ट को लक्ष्य (एनसीआई) से हटाकर अपने करियर को पूरी तरह से बर्बाद करने की धमकी देने की बात निकल कर सामने आई थी।,कितना संघर्ष करना पड़ता है और कितनी ऐसी लड़ाइयाँ लड़ती हैं जिन लड़ाइयों की नौबत ही नहीं पैदा होनी चाहिए। और ऐसी घटनाओं से खेल जगत में भविष्य देखने वाली युवा लड़कियों का मनोबल भी टूटता है। जिस तरह आये दिन खेल जगत से महिलाओं के साथ अभद्रता की खबरें बाहर आ रही हैं ये उभरती हुई युवा महिला खिलाड़ियों के रास्ते का रोड़ा बनती जा रहीं हैं।हमारे देश में पहले से ही लड़कियां का खेलना अधिकतर अभिभावक और समाज पसंद नहीं करता था, और अब जब लोगों की सोच में थोड़ा बहुत खुलापन और विस्तार आ रहा था, जब लोगों को लगने लगा था कि हां, खेल सिर्फ खेल नहीं है बल्कि बहुत कुछ है, जिसमें अपना हुनर दिखाने का लड़के-लड़कियों सभी को बराबर अवसर मिलना चाहिए।आज जब खेल के प्रति सदियों से चलती आ रही रूढ़िवादी विचारधाराओं को महिला खिलाड़ियों ने खेल के मैदान में झंडे गाड़ कर अपना लोहा मनवा रहीं हैं और लोगों का महिलाओं के प्रति लोगों का नजरिया बदल रहीं हैं तो ऐसी घटनाएं इन सभी खिलाड़ियों के मेहनत पर पानी फेरने का काम कर रहीं हैं।पहले से ही बहुत कम अभिभावक अपने बेटियों को खेल जगत में भेजते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इसमें उनकी बेटियां सुरक्षित नहीं है और न ही उनकी इज्जत है।और अब ऐसी घटनाएं होने के बाद अधिकतर अभिभावक अपनी बेटियों को इस खेल जगत में भेजने से बचेंगे।क्योंकि हर अभिभावक के लिए सबसे अधिक जरूर कोई चीज होती है तो उनके बच्चों की सुरक्षा। इसलिए खेलों में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की सख्त जरूरत है।और ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही करने और सज़ा देने की जरूरत है जिससे दुबारा कोई ऐसी हरकत करने के बारे में सोचने से रूह काँप जाए। 

20 टिप्‍पणियां:

  1. आज का कडवा सच... बहुत सटीक रचना

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  2. मनीषा, क्षेत्र चाहे जो भी हो हर जगह महिलाए असुरक्षित ही है। हर जगह महिलाओं को अपने अधिकार की लड़ाई लड़नी ही है। ऐसी घटनाएं सच मे प्रतिभावान महिलाओनके सपने तोड़ देती है। विचारणीय आलेख।

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  3. इस लेख का ऊपर का हिस्सा शायद दो बार पोस्ट हो गया है ...... कृपया जाँच लें .

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    1. त्रुटियों से अवगत कराने के लिए धन्यवाद🙏💕

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  4. बहुत सटीक समसामयिक लेख ।

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  5. कड़वे सच को उजागर करता विचारोत्तेजक लेख। यदि सोशल मीडिया पर हर कोई इन महाशय की क्ठोर आलोचना करते हुए अपनी खिलाड़ी बेटियों की सुरक्षा की गारंटी की माँग उठाए तो कुछ हो सकता है। मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका होती है। परंतु सोचकर ही मन डरता है यह कि खेल, , फिल्म, शिक्षा, पुलिस आदि सभी विभागों में लड़कियाँ कितना सहती होंगी बढ़ने के लिए.... आवाज उठानेवालों की संख्या बहुत कम है आज भी।

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    1. आपने बिल्कुल सही कहा मैम अगर सभी लोग आवाज उठाने लगे तो इन जैसे हवस के पुजारी का जन्म ही न हो इस समाज में!
      तहेदिल से बहुत बहुत धन्यवाद प्रिय मैम🙏

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  6. इतने सार्थक, सामयिक, समीचीन, सटीक, अपेक्षित और अपरिहार्य सारगर्भित लेख के लिए हृदय से आभार!!! लेखनी यूँ ही चलती रहे और स्याही कभी सूखे नहीं!!! बधाई!!!

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    1. जी सर,कभी स्याही कभी नहीं सूखने दुंगी मेरी कलम ही है मेरी पहचान, मेरा सम्मान मेरा सब कुछ!
      मनोबल बढ़ाती हुई प्रतिक्रिया के लिए आपका तहेदिल से धन्यवाद🙏💕

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  7. क्या गज़्ज़ब की लेखनी है आपकी खुरच-खुरच कर सच को बाहर निकालना आसान नहीं है । ओजपूर्ण लेख जिसे पढ़कर रक्त में उबाल आ जाये। जिस विषय पर आपने लिखा है उसकी गहराई में छुपी घुटन,दर्द और प्रताड़ना का लोग सिर्फ़ अंदाज़ ही लगा सकते है पर जो भुग्तभोगी हैं उनकी मनोदशा शायद ही समझ सकते हैं।
    लेखनी की धार टा पैनापन सदा बना रहे।
    स्नेहाशीष।

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    1. जिस सच्चाई को आंखों से देखा गया हो उसे लिखने में कलम की स्याही कम नहीं पड़ती अपितु कलम में स्याही के रूप में रक्त उतर आता! डर ,आक्रोश में तब्दील हो जाता है! पर बहुत दु:ख होता है जब लोग ऐसी चीजों का विरोध करना तो दूर की बात इस पर अपनी राय देना भी जरूरी नहीं समझते और जो आवाज उठा रहा होता है उसका सर्मथन करने के बजाय विरोध करते हैं! आप सभी का सर्मथन ही है जो मुझे किसी भी मुद्दे पर बेझिझक लिखने में एक बार भी सोचना नहीं पड़ता और ना हि डर लगता!
      आपका दिल की गहराइयों से बहुत बहुत धन्यवाद प्रिय मैम🙏

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  8. बहुत ही ज्वलंत मुद्दा है। हमें अपने कार्य स्थल पर इस तरह की जाने कितनी समस्याओं से जूझना पड़ता है। यह समस्या किसी एक जगह की नहीं है, कदाचित कुछ जगहों पर ज्यादा है। यही वजह है कि महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं। कहने को तो आजकल महिलाएं पुरुषों से कदम मिला के चल रहीं हैं पर उनके दर्द को समझ पाना, जो इस प्रताड़ना से गुजर रही हैं कठिन है।

    विचारणीय लेख

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    1. जी आपने बिल्कुल सही कहा !कहने को तो सब साथ होते हैं पर महिलाओं के दर्द को समझ पाना बहुत ही मुश्किल होता है और जो बोलते है कि पहले क्यों नहीं आवाज उठाई वे एक बार भी नहीं सोचते कि देर आए दुरुस्त आए!
      बेहतरीन प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया 🙏

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  9. इस गंभीर मुद्दे पर इतना सटीक और बेबाक लेखन.. बहुत अच्छा लगा पढ़कर तुम्हारे साहस भरे आलेख को। मैं जो सोच रही थी वो तुम्हारी लेखनी लिख गई, इस मुद्दे के उछलने के बाद से ही कई लोगों से मैंने भी जानने की कोशिश की और जानकर बड़ा दुख हुआ कि लोग इतने गंभीर मुद्दे पर भी लीपापोती करने पे तुले हुए हैं, राजनीति एक लड़की या स्त्री के चरित्र से ऊपर की बात हो गई है, स्त्री उत्थान तो बस दिखावा है, और अगर है कहीं तो बस एक प्रतिशत। बाकी तो स्त्रियों से ज्यादा बेहतर कौन समझ सकता है सशक्तिकरण ।
    एक बार फिर तुम्हारे लिए शुभकामनाएं प्रिय मनीषा।

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    1. ये दुर्भाग्य ही है देश का मैम कि अधिकतर लोग ऐसे गंभीर मुद्दे को लीपापोती करने में ही लगें हैं, और आपको भी कुछ हद तक तो सच्चाई पता ही होगी कि जिन पर आरोप लगा है वो किस हद तक सही है!
      मनोबल बढ़ाती हुई प्रतिक्रिया देने के लिए आपका तहेदिल से बहुत बहुत आभार प्रिय मैम🙏🙏

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  10. हर लफ़्ज़ सच्चाई में डूबा है. सलाम हमारी इन बेटियों की हिम्मत को भी और आपकी बेखौफ़ क़लम को भी.

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खेलने का फैसला करने से लेकर खेल के मैदान तक सफर

कुश्ती के अखाड़े में जिन शेर और शेरनियों को लड़ते हुए देखते थे उन्हें आज जंतर मंतर पर अपने स्वाभिमान,अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ना पड़ रहा है...