शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

वो जिस्म बेचती है तो वो बाजारू कहलायी लेकिन जिस्म को खरीदने वाले.....?

पता है मुझे बहुतों को मेरा ये लेख आपत्तिजनक और  अश्लीलता से भरा हुआ लगेगा ! रास नहीं आयेगा शीर्षक देखकर ही अनदेखा कर देंगे ! लेकिन इससे हकीकत नहीं बदल जाता! 
वैश्या बदचलन और चरित्रहीन तो है ही इस लिए तो समाज का तिरस्कार और समाज द्वारा दिये गये अनेक नाम के साथ खमोशी के साथ जीती  है! पर क्या कोई औरत जन्म से ही वैश्या होती ?क्या वो पैदाइशी चरित्रहीन होती है ? क्या उसके माथे पे लगे वैश्या के ठप्पे में सिर्फ़ उसका अकेले का हाथ होता है ? हाँ वो जिस्म बेचती है वो चरित्रहीन ! उसकी अपनी कोई इज्जत नहीं! पर उनका क्या जो उसे चरित्रहीन बनाते? जो इसके जिस्म को अपनी हवस की प्यास को बुझाने के लिए खरीदते हैं और उसके माथे पर वैश्या का ठप्पा लगाते हैं? रात के अंधेरे में रातेरंगीन करने जाने वाले शरीफजादे और नवाबजादो को क्यों नहीं कोई नाम दिया गया ? क्या इसलिए कि ये लोग छुप कर करते हैं? और
वैश्या डंके की चोट पर अपने जिस्म का व्यापार करती है तभी तो पूरी दुनिया का तिरस्कार सहती है! 
पर उन चरित्रवान पुरुषो का क्या जो अपनी पत्नी, अपने परिवार की नजरो से बचकर अपने हवस की प्यास बुझाने बदनाम गलियों में जाते हैं ? क्या ये लोग चरित्रहीन नहीं होते? ये लोग तो चरित्रहीन होने के साथ धोखेबाज़ और विश्वासघाती भी होते हैं । वैश्या फिर भी धोखेबाज नहीं होती।वो अपने जिस्म व्यापार करती है पर किसी की भावनाओं के साथ विश्वासघात नहीं करती । 
अगर वो पैसों की भूखी रहती है, तो ये समाज के ठेकेदार भी तो जिस्म के भूखे होतें हैं! 
जिस बदनाम गलियों को सुबह के उजाले में तिरस्कार भरी नजरों से देखते , रात होते ही उसी बदनाम गलियों में अपनी रातें रंगीन करते हैं !वो अपना जिस्म बेचती है,तो ये भी तो अपना ईमान बेचते हैं! तो फिर उसे ही अकेले हमेशा अपमानित क्यों किया जाता है? 
वैश्या अति सस्कारी और चरित्रवान पुरुषों की हवस  को छिपाने वाली वो लिबास है जिसके उतरते ही ये पुरुष ,समाज के सामने इस तरह निवस्त्र होगें कि फिर वस्त्र धारण करने के काबिल ही नही रह जाएगें! मुहं छिपाने की जगह नहीं मिलेगी! 
और चरित्रवान होने का ढोंग करने वालों का घमण्ड और परिवार एक साथ इस तरह टूटेगा कि फिर उसे दुनिया के सबसे काबिल  कारीगर भी नहीं जोड़ पायेगें! 
और अगर सभी लोग इतने ही चरित्रवान हैं तो फिर इन वैश्याओं का धन्धा आज भी कैसे चल रहा है ?ये रइसजादे जो बात बात पर  खुद को अच्छे , शरीफ़ खानदान का होने की अकड़ दिखाते रहतें हैं ,तो रातों को जिस्मों को खरीदने का हुजूम किसका लागता है? आखिर कौन है जो उन बदनाम गलियों में जाता है? क्या वो गरीब, जो दो वक्त की रोटी के लिए पूरे दिन मेहनत करता है लेकिन रात को पैसे इकट्ठा होते ही अपने जिस्म की भूख मिटाने चला जाता है? लेकिन ये भी सच है कि सभी अमीर  जिस्म के खरीददार नहीं होते पर जिस्म की कीमत लगाने वाले सभी अमीर ही होते हैं! 
और जिन गरीब और मध्यवर्गीय हवस के शिकारियों की पहुँच से ये कोठा बाहर होता है वे हवस को मिटाने के लिए बलात्कारी बन जाते हैं !  शुक्रगुज़ार होना चाहिए वैश्याओं का , कि वैश्यावृत्ति की बदोलत रइसजादे बलात्कारी बनते ,नहीं तो न्याय की कल्पना करना भी गुनाह हो जाता! 
 ये सच है कि इस समाज के नज़र में वैश्या की कोई इज्जत और औकात नही क्योंकि ये इसी की हकदार हैं! लेकिन ये बात भी नही भूलनी चाहिए कि इन्हें वैश्या बनाने वाले इस समाज के लोग ही हैं! और ये बात भी याद रखनी चाहिए कि वैश्या की नजरों में नोटों से घिरे नवाबों और चरित्रवान होने का ढोंग करने वालो की कोई औकात नहीं होती!  तो क्या कोई मुझे बता सकता है कि कौन अधिक गिरा हुआ इंसान है वो जो सबकी नजरों में गिरा हुआ है या फिर वो जो, सबकी नजरों में गिर चुके इंसान की नजरों में गिरा हुआ है? 
वैश्या अपने पेट की आग बुझाने के लिए अपने जिस्म को बेचती है और ये चरित्रवान लोग अपने हवस की भूख मिटाने के लिए अपने ईमान को जिस्म के हाथों बेच देते है !  जब निवस्त्र दोनों होतें हैं ,तो फिर एक पर ही क्यों कलंक का ठप्पा लगता है? किसी एक को ही क्यों वैश्या का नाम मिलता है? 
जिस्म को करके हवस के पुजारियों के हवाले, 
खड़ी हो जाती है , 
एक कोने में जाके! 
स्तब्ध सी निहारती रहती है , 
जिस्म को नोच रहें गिद्धों को, 
और इक वैश्या के आगे बेनकाब होती शराफत को! 
नोट-  आलोचनात्मक टिप्पणी करने की पूरी स्वतंत्रता है! पर शब्दों की सीमा का ध्यान रखें! 

रविवार, 18 जुलाई 2021

काले मेघ

कच्ची माटी के गाँव में , 
जब काले-काले मेघ आते हैं, 
कृषक  के मन में उम्मीदों का दिया जलाते है । 
जब रंग - बिरंगी फसलों पर, 
काली घटा छा जाती है। 
फिर रंग - बिरंगे दानों में, 
मोती सी चमक आ जाती है 
कच्ची माटी के गाँव में, 
जब काले- काले मेघ आते है। 
सूरज की आग से झुलस चुके 
चरागाहों को फिर से हरा भरा कर जाते है
गीली माटी का ठण्डा पन , 
हवा के झोंको में भर जाते हैं
कच्ची माटी के गाँव में जब 
निखरे - निखरे मौसम -आते हैं
गीली माटी की सोंधी खुशबू से 
घर आँगन महका जाते हैं! 
मीठी हरियाली की खुशबू, 
मंद हवाओ संग सुनहरी किरणों के साथ
हर दरवाजे़ पर दस्तक दे जाती है । 
सुबह ओस से गीले खेतों को, 
सुनहरी किरणें जब स्पर्श करती है , 
किसानो के लबों पे , 
मोती सी मुस्कान बिखेर जाती है । 
कच्ची माटी के गाँव में , 
काले मेघ अपने संग खुशियाँ लाते हैं! 

शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

जितनी तकलीफ़ सपने अधूरें रह जाने पर होती है, उतनी खुशी पूरा होने पर क्यों नहीं मिलती?

मेरी रचना "जिंदगी की शाम" जिसको अमर उजाला की सप्ताहिक पत्रिका रुपायन में 14 मई  को प्रकाशित किया गया । जिसे अगर आप देखना चाहते हैं तो लेबल-  अकेलापन पर क्लिक करके देख सकते हैं! 
प्रकाशित हुए तो महीनों हो गयें पर मुझे जानकारी अभी  हाल ही में मिली क्योंकि उस वक्त अखबार वाले चाचा जी बिमार थे इसलिए अखबार नहीं आ पा रहा था और जिस फोन से मैंने रचना को प्रकाशित करने के लिए ई -मेल किया था वो फोन भी खराब था! 
खैर,  
अब मुद्दे पर आते हैं, मेरा मकसद आप लोगो को ये बताने का नहीं कि मेरी रचना प्रकाशित की गई,  बल्कि मेरे मन  में उठ रहे कुछ सवालों का जवाब ढूढ़ना है! जब मैंने अपनी रचना को प्रकाशित करने के लिए  भेजा था, तब मैं बहुत उत्साहित और खुश थी, ये बात सोच कर  कि जिस दिन मेरी रचना रूपायन में प्रकाशित होगी उस दिन  उन लोगों का मुंह बंद हो जाएगा जो मेरे हुनर का मजाक उड़ाते हैं , और जब मेरे दादा जी मेरी फोटो के साथ मेरी रचना को रूपायन में देखेंगे तो बहुत खुश होगें! (ये रचना मैंने अपने दादा जी पर ही लिखी है) 
हर शुक्रवार का मैं बेसब्री से इंतज़ार करती रहती थी ! और पत्रिका उठा कर देखती , मेरी कविता प्रकाशित न होने पर मैं बहुत ही निराश हो जाती थी, क्योंकि दिसम्बर से मैं प्रकाशित कराने के लिए कोशिश कर रही थी! मेरे लिए सपने जैसा हो गया था प्रकाशन कराना! ऐसा लगता था कि वो दिन बहुत ही खूबसूरत होगा मेरे लिए जिस दिन मेरी रचना को रूपायन में जगह मिलेगी! किन्तु अब जब प्रकाशित हो चुकी  है,तो मुझे कुछ खास खुशी नहीं मिली, उतनी भी नहीं जितनी प्रकाशित न होने पर निराशा  और तकलीफ़ मिलती थी! 
ऐसा क्यों होता है कि जितना सपने के सच होने के बारे में सोच कर खुशी मिलती है, उतनी खुशी सच होने पर नहीं मिलती? 
मैं मानती हूँ ये बहुत बढ़ी उपाधि नहीं है पर ये भी सच है कि मेरी उम्र के जितने लोग मेरे पहचान के हैं उनसे तुलना करें तो इतनी छोटी भी नहीं है! 
किन्तु जब ये ख्वाहिश अधुरी थी, तो बहुत ही बड़ी बात लगती थी, ऐसा क्यों होता है, कि जब सपने या ख्वाहिशें अधूरी रह जाती हैं तो बहुत बड़ी बात और  महत्वपूर्ण लगती हैं ,और उसके लिए किये गए प्रयास बहुत ही अधिक लगते हैं पर जब पूरी हो जाती हैं तो सारे प्रयास बहुत ही कम लगते हैं? और अब मुझे ऐसा लगता है कि उस दिन मुझे असली खुशी मिलेगी जिस दिन मेरी पुस्तक प्रकाशित होगी! मुझे ऐसा क्यों लगता है कि जितनी खुशी खुली आँखों से सपने देखने मिलती है   उतनी खुशी सच होने पर नहीं मिलती? जीतने के बाद, जीत के लिए किये गए सारे संघर्ष  हम कुछ ही दिनों में भूल जाते हैं,और वही जब सपना अधूरा रह जाता है तो खुशी की तुलना में कहीं अधिक तकलीफ़ मिलती है जो महीनों तो कभी कभी सालों तक बरकरार रहती है क्यों? फिर सपना छोटा हो या बड़ा, हार छोटी हो या बड़ी! 
ऐसा क्यों होता है? 


सोमवार, 12 जुलाई 2021

क्यों नहीं मिलती खुशी किसी को ईसानियत का फर्ज़ अदा कर?

कड़वा सत्य! 
कोई शांति के लिए भगवान को पूजता है , 
तो किसी को मिल जाती है खुशी, पत्थर पूज कर ! 
क्यों नहीं मिलती खुशी किसी को ईसानियत का फर्ज़ अदा कर?
भूखे बच्चों को नजरअंदाज करके , 
पत्थर की मूर्ति को छप्पन भोग लगाया जाता है,  
पत्थर की मूर्ति को सोने के पलने में सुलाया जाता है । 
और बे घर लोगों को फुटपाथ पर, 
खुले असामान के नीचे सोने के लिए छोड़ दिया जाता है!
पत्थर की मूर्ति के आगे दिन में भी घी के दीपक का प्रकाश है, 
पर झुग्गी - झोपड़ियों में आज भी अधियारे का राज है।
मंदिर मे करोड़ों दान कर दिया जाता है ,
पर एक गरीब से पैसे, 
सूत ब्याज सहित वापस ले लिया जाता है ! 
एक ढोंगी भगवा धारी को अतिथि कक्ष में ठहराया जाता है , 
वहीं एक बे सहारा को नौकर बना लिया जाता है।
इसिलिए तो आस्था के नाम पर हो रहा विश्वासघात है ! 
यहाँ पत्थर की नारी को सिर झुकाया जाता है , 
और जीवित नारी का प्रतिदिन चीरहरण किया जाता है! 
पत्थर की मूर्ति के खातिर इंसान,
इंसानियत का हत्यारा बन जाता है , 
मंदिर, मस्जिद, हिन्दू ,मुस्लिम के चक्कर में, 
इंसानियत का धर्म भूल जाता है ! 
मुझे आपत्ति नहीं किसी के पूजा और पाठ से ,
आपत्ति तो बस अंधविश्वास से । 
मानवता से बड़ कर मेरे लिए कोई धर्म नहीं ! 

वो जिस्म बेचती है तो वो बाजारू कहलायी लेकिन जिस्म को खरीदने वाले.....?

पता है मुझे बहुतों को मेरा ये लेख आपत्तिजनक और  अश्लीलता से भरा हुआ लगेगा ! रास नहीं आयेगा शीर्षक देखकर ही अनदेखा कर देंगे ! लेक...