शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

जितनी तकलीफ़ सपने अधूरें रह जाने पर होती है, उतनी खुशी पूरा होने पर क्यों नहीं मिलती?

मेरी रचना "जिंदगी की शाम" जिसको अमर उजाला की सप्ताहिक पत्रिका रुपायन में 14 मई  को प्रकाशित किया गया । जिसे अगर आप देखना चाहते हैं तो लेबल-  अकेलापन पर क्लिक करके देख सकते हैं! 
प्रकाशित हुए तो महीनों हो गयें पर मुझे जानकारी अभी  हाल ही में मिली क्योंकि उस वक्त अखबार वाले चाचा जी बिमार थे इसलिए अखबार नहीं आ पा रहा था और जिस फोन से मैंने रचना को प्रकाशित करने के लिए ई -मेल किया था वो फोन भी खराब था! 
खैर,  
अब मुद्दे पर आते हैं, मेरा मकसद आप लोगो को ये बताने का नहीं कि मेरी रचना प्रकाशित की गई,  बल्कि मेरे मन  में उठ रहे कुछ सवालों का जवाब ढूढ़ना है! जब मैंने अपनी रचना को प्रकाशित करने के लिए  भेजा था, तब मैं बहुत उत्साहित और खुश थी, ये बात सोच कर  कि जिस दिन मेरी रचना रूपायन में प्रकाशित होगी उस दिन  उन लोगों का मुंह बंद हो जाएगा जो मेरे हुनर का मजाक उड़ाते हैं , और जब मेरे दादा जी मेरी फोटो के साथ मेरी रचना को रूपायन में देखेंगे तो बहुत खुश होगें! (ये रचना मैंने अपने दादा जी पर ही लिखी है) 
हर शुक्रवार का मैं बेसब्री से इंतज़ार करती रहती थी ! और पत्रिका उठा कर देखती , मेरी कविता प्रकाशित न होने पर मैं बहुत ही निराश हो जाती थी, क्योंकि दिसम्बर से मैं प्रकाशित कराने के लिए कोशिश कर रही थी! मेरे लिए सपने जैसा हो गया था प्रकाशन कराना! ऐसा लगता था कि वो दिन बहुत ही खूबसूरत होगा मेरे लिए जिस दिन मेरी रचना को रूपायन में जगह मिलेगी! किन्तु अब जब प्रकाशित हो चुकी  है,तो मुझे कुछ खास खुशी नहीं मिली, उतनी भी नहीं जितनी प्रकाशित न होने पर निराशा  और तकलीफ़ मिलती थी! 
ऐसा क्यों होता है कि जितना सपने के सच होने के बारे में सोच कर खुशी मिलती है, उतनी खुशी सच होने पर नहीं मिलती? 
मैं मानती हूँ ये बहुत बढ़ी उपाधि नहीं है पर ये भी सच है कि मेरी उम्र के जितने लोग मेरे पहचान के हैं उनसे तुलना करें तो इतनी छोटी भी नहीं है! 
किन्तु जब ये ख्वाहिश अधुरी थी, तो बहुत ही बड़ी बात लगती थी, ऐसा क्यों होता है, कि जब सपने या ख्वाहिशें अधूरी रह जाती हैं तो बहुत बड़ी बात और  महत्वपूर्ण लगती हैं ,और उसके लिए किये गए प्रयास बहुत ही अधिक लगते हैं पर जब पूरी हो जाती हैं तो सारे प्रयास बहुत ही कम लगते हैं? और अब मुझे ऐसा लगता है कि उस दिन मुझे असली खुशी मिलेगी जिस दिन मेरी पुस्तक प्रकाशित होगी! मुझे ऐसा क्यों लगता है कि जितनी खुशी खुली आँखों से सपने देखने मिलती है   उतनी खुशी सच होने पर नहीं मिलती? जीतने के बाद, जीत के लिए किये गए सारे संघर्ष  हम कुछ ही दिनों में भूल जाते हैं,और वही जब सपना अधूरा रह जाता है तो खुशी की तुलना में कहीं अधिक तकलीफ़ मिलती है जो महीनों तो कभी कभी सालों तक बरकरार रहती है क्यों? फिर सपना छोटा हो या बड़ा, हार छोटी हो या बड़ी! 
ऐसा क्यों होता है? 


20 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(१७-०७-२०२१) को
    'भाव शून्य'(चर्चा अंक-४१२८)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. आपका फ़र्ज़ है प्रयास करना और वो भी पूरी ईमानदारी से
    सरलता स्वतः आती है
    लगन बनाए रखें … लेखन में निरंतर सुधार होता रहेगा …
    एक न एक दिन सरलता भी मिलेगी … बहुत शुभकामनाएँ …

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  3. हमेशा प्रयास करते रहिए.. शुभकामनाएं।

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  4. गहन मंथन को प्रेरित करती आपकी लेखनी।

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    1. आपका बहुत बहुत आभार और धन्यवाद सर🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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  5. इंसान की फितरत है कि जो प्राप्त नहीं है उसके पीछे भागने की । जो प्राप्त है उसमें खुशी नहीं मिलती ।
    जैसा आपने लिखा कि ये कविता आपने अपने दादा जी पर लिखी है , तो बस एक सुझाव है कि आप उनकी झुर्रियों की बेचैनियों को अपने प्यार से थोड़ा कम कर दें तो आपको शायद अपार खुशी मिलेगी ।
    मेरी इस अनाधिकार चेष्टा को क्षमा कीजियेगा ।

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    1. अपनी इस चेष्टा को अनाधिकारिक चेष्टा कह कर क्षमा करने की बात मत कीजिये मैम प्लीज 🙏
      और आपने कहा कि मैं बेचैनियों को अपने प्यार से कम करने की कोशिश करूँ तो मुझे बहुत खुशी मिलेगी, आपने बिल्कुल सही कहा है मैम,
      बहुत खुशी मिलती है ऐसा करके और अब बेचैनियाँ काफ़ी हद तक शायद कम हो गयीं हैं क्योंकि ये रचना मैंने पिछले साल इसी महीने में लिखी थी,लेकिन अब सब कुछ पहले से बहुत बेहतर हो गया है!
      ये बात तो सच है कि किसी के दर्द को कम करके जो खुशी मिलती है वो किसी और चीज से नहीं! ये तो भावनात्मक बातें हो गयीं और भावनात्मक चीज से अत्यंत खुशी मिलती है इस में कोई शक नहीं!
      पर मेरा सवाल प्रैक्टिकल चीजों को लेकर है जैसे कि जिस सफलता के लिए हम दिन रात एक कर देतें हैं उसी की प्राप्ति पर हमें उतनी खुशी क्यों नहीं मिलती जितनी असफल होने पर तकलीफ़ अर्थात दुख हमेशा खुशी की तुलना अधिक क्यों महसूस किया जाता है? खैर..
      आपका बहुत बहुत धन्यवाद और आभार मैम आपकी इस प्यारी सी टिप्पणी के लिए और मुझे सलाह देने के लिए 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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  6. यही फितरत होती है मानव मन की अलभ्य ही सुखाकर कहोता है।
    सुलभ सामान्य ठीक प्रतिकूलता भी ऐसे ही विपरित भाव चैतन्य में स्थापित करनते हैं।
    कविता सत्य का दर्शन करवा रही है हृदय स्पर्शी।

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    1. दिल की गहराइयों से आपका बहुत बहुत आभार और धन्यवाद मैम 🙏🙏

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  7. सुखकर होता है पढ़े, कृपया 🙏🏼

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    1. मैं कोशिश करूंगी! मैम,
      🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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  8. मानव मन की प्रकृति ही ऐसी है मनीषा जी ! जो नहीं मिलता उसे पाने की चाह में अनवरत दौड़ता रहता है और जो मिल गया उसे 'अपना है' समझ भूल जाता है । बहुत सुन्दर और सच लिखा है आपने ।


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    1. आपका बहुत बहुत आभार और तहेदिल से धन्यवाद मैम🙏🙏🙏🙏🙏

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  9. "जो पा लिया उसका महत्व स्वतः ही कम हो जाता है " जो नहीं मिला उसके लिए तड़प जीवन भर रहता है,यही जीवन सत्य है मनीषा।
    क्योंकि ख़ुशी आत्मिक ही होती है और वो भावनात्मक ही मिल सकती है और स्थाई भी रहती है। किसी बाहरी वस्तु और सफलता की ख़ुशी तो क्षणिक होती है।
    मगर फिर भी इंसान इस क्षणिक ख़ुशी के पीछे ही भागता है। जब कि- नहीं समझता बाहरी वस्तु और सफलता का पाना आपकी महत्वकांक्षा है ख़ुशी नहीं। महत्वकांक्षा और ख़ुशी में फर्क समझ नहीं आता। प्रश्न तो तुम्हारा गंभीर है जो सबके मन में उठता है।ढेर सारा स्नेह तुम्हे

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    1. हाँ मैम वही तो समझ नहीं आता कि हमेशा दुख को हम खुशी की तुलना में कहीं अधिक क्यों महसूस करते हैं जबकि खुशी के पल को बहुत ही जल्द भूल जाते हैं!

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    2. आपकी इस स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए तहेदिल से धन्यवाद🙏💕

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  10. रूपायन में रचना का प्रकाशित होना निश्चय ही उपलब्धि है जिसके लिए आप बधाई की पात्र हैं। और जो सवाल आपने उठाया है, उसका जवाब किसी से मत पूछिए क्योंकि जवाब आपको अपने भीतर से ही मिलेगा जैसे हर किसी को मिलता है।

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