नारी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नारी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, नवंबर 20, 2021

क्यों नन्ही सी कली खिलने से पहले ही तोड़ दी जाती है?

क्यों हमारे सपने डायरी के पन्नों में 
ही सिमट कर रह जाते हैं ?
क्यों बाहर निकलने से घबराते हैं ?
यदि डायरी से बाहर आ भी जाते हैं 
तो एक ऊंची उड़ान भरने से पहले 
क्यों उनके पंख तोड़ दिए जाते हैं ?
सपनों की दुनिया 
क्यों एक डायरी में ही 
सिमट कर रह जाते हैं? 
क्यों हमारी ख्वाहिशों का 
खुली हवा में एक लंबी सांस भरने से 
पहले गला घोट दिया जाता है? 
हमारी आंखों में सुनहरे सपने 
पलने से पहले ही 
क्यों खौफनाक मंजर भर दिए जाता है ? 
क्यों हमें अपने सपने को 
सिर्फ डायरी तक ही सीमित 
रखने का अधिकार है ? 
क्यों हमारे विचारों को चारदीवारी में 
कैद करने का हर संभव प्रयास किया जाता है? 
क्यों हमारे अपनों द्वारा हमेशा 
यह नसीहत दी जाती है , 
कि घर के बाहर के मामले में 
दखल करना लड़कियों के संस्कार नहीं ? 
क्यों हमेशा हमें संस्कारी बनाने के 
नाम पर बेचारी बनाया जाता है? 
क्यों हमेशा हमें  सिर्फ सहना 
सिखाया जाता है? 
कुछ तो कर रहीं अंतरिक्ष में नाम दर्ज, 
तो कुछ निभा रहीं देश भक्ति का फर्ज! 
पर कुछ अभी कर रही चौखट के 
बाहर निकलने का ही संघर्ष! 
क्यों कुछ को चौखट के 
बाहर जाने का भी अधिकार नहीं? 
क्यों पुत्र मोह में अंधी मां द्वारा
नन्ही-सी कली खिलने से 
पहले ही तोड़ दी जाती है? 
क्यों कुछ इस दुनिया में 
आने के खातिर कर रहीं हैं संघर्ष? 

बुधवार, अगस्त 25, 2021

महिलाएँ और उनके अधिकार !

तस्वीर गूगल से
कुछ छू रहीं आसमान, 
तो कुछ नहीं कर पा रहीं 
घर की दहलीज भी पार! 
जब भी करती है एक स्त्री
एक महिला के रूप में बात! 
उसके अपने ही बन जाते हैं
उसके राहों की दिवार! 

कभी मां का,कभी बेटी का, 
तो कभी पत्नी आदि रिश्तो का 
हवाला देकर अप्रत्यक्ष रूप से, 
उसके अंदर की नारी को
मारने का करतें हैं प्रयास!
खुद ही करते अपमान,
और खुद ही करते सम्मान की बात! 

बराबरी के अधिकार की लड़ाई में 
महिलाओं की एड़ियाँ घिस रही आज, 
किंतु आरक्षण हर बार 
महिलाओं की काबिलियत पर 
समाज को दे देता है
सवाल उठाने का अधिकार! 
खुद ही करते भेदभाव 
और खुद ही करते समानता की बात! 

जब भी एक स्त्री 
एक महिला के रूप में 
आवाज उठाती है ! 
तो इस समाज को वो
फूटी आंख भी नहीं भाती है! 

जो स्त्री मां, बेटी ,और बहू 
बनते बनते नारी बनना भूल जाती है ! 
वही स्त्री इस समाज को भाती है! 
उसी को संस्कारी होने की
उपाधि दी जाती है! 

नारी सशक्तिकरण के लिए पितृसत्तात्मक समाज का दोहरापन

एक तरफ तो पुरुष समाज महिलाओं के अधिकारों और उनके सम्मान की बात करता है और वहीं दूसरी तरफ उनके रास्ते में खुद ही एक जगह काम करता है। जब समाज ...