शुक्रवार, 4 जून 2021

जिन्दगी की शाम

 कहने को उसका पूरा परिवार है,

फिर भी उसकी जिन्दगी विरान है!

परिवार रूपी बगीचे को लगाने वाला माली,

उसी बगीचे की छांव के लिये मोहताज है!

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जिन पौधों को प्रेम और स्नेह 

से सीच कर हरा भरा किया था,

उन्हीं के बीच खुद उदास बैठा आज है!

झुर्रीदार चेहरे में बैचेनिया छुपी हजार है,

पर इस बैचेनियो का किसी को नही एहसास है!

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जिन्दगी की इस शाम में अकेला वो आज है!

जिससे परिवार रूपी बगीचे में आया बसन्त  है

उसी की जिन्दगी में पतझड़ लगा आज है!

जिन हाथो ने छोटी छोटी उंगलियों को 

पकड़ कर चलना सिखाया था,

उन्हीं उंगलियों को खुद पर उठता देख हैरान है!

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होली के रंग तो उसके चेहरे पर लगे है, 

पर जिन्दगी में फीके खुशियों के रंग है!

पास होकर भी कोई नही उसके साथ है!

जो कंधे बच्चों को पूरे मेेेले की सैैैर कराया करते थे,

उन्हीं की जिन्दगी एक काठ की छड़ी पर टिकी आज है!

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जिन्दगी के इस सफर में आकेला आज है,

बच्चों की तरह वो खुद से करता रहता संवाद है!

फिर भी अपने बच्चों की 

खुशियों के लिए हर पल करता फरियाद है!

आखिर वो इक बाप है! 

जिन्दगी की शाम

  कहने को उसका पूरा परिवार है, फिर भी उसकी जिन्दगी विरान है! परिवार रूपी बगीचे को लगाने वाला माली, उसी बगीचे की छांव के लिये मोह...