सोमवार, दिसंबर 06, 2021

निशब्द


उस बस्ती में रोज की तरह आज भी चूल्हे से उठता धुआं बगल में लगे कूड़े के डेर से उठती असहनीय बदबू वहीं पास में खेल रहे बच्चे और बगल में बह रहा गंदा नाला बस्ती से सटी गगनचुंबी बिल्डिंग्स जिसमें हजारों लोग रहते हैं जिस तक पहुंचने के लिए चमचमाती सड़कें जिस पर अनेकों लोग आ जा रहे होतें हैं! पर एकदम शांति थी सिर्फ मोटर कार की आवाज ही आ रही होती है और वहीं बस्ती में शाम के वक्त कुछ ज्यादा ही चहल पहल रहता है भेड़, बकरियों की आवाज बच्चे के रोने की आवाज आदि आ रही होती है! बस्ती तक पहुंचने के लिए कच्ची सड़कें थी! यह दृश्य अमीरी और गरीबी के बीच की असमानता को साफ साफ दर्शा रहा था! अमीर और गरीब के बीच की खाई दूर से ही देखकर महसूस किया जा सकता था! कच्ची सड़कों पर कुछ बच्चे एक साथ कूड़े से मिले जरूरी सामान को बोरी में भरकर पीठ पर लादे आपस में जोड़ घटाव करते हुए जा रहें होते हैं, कुछ खुश तो कुछ उदास दिख रहें होतें हैं ! तभी बगल से एक लंबी सी चमचमाती कार धूल उड़ाते हुए निकलती है कार को देखकर सभी बच्चे कार के पीछे दौड़ पड़ते हैं यह सोच कर कि कोई सोशल वर्कर उनके लिए कुछ लेकर आया होगा! कार बस्ती के बीचो बीच में जाकर रुकती है! आसपास के सभी बच्चे कार को घेर कर खड़े हो जाते हैं तभी कार का दरवाजा खुलता है जिसमें से घुंघराले बालों अच्छी कद काठी वाला लगभग 45 -55 की उम्र का एक व्यक्ति निकलता है जिसके हाथ में एक मोटी सी डायरी और कलम होती है ,आंखों पर गोल फ्रेम का ऐनक पहन रखा होता है! जो कि एक मशहूर लेखक था पर बच्चों के लिए अजनबी था! सभी बच्चे बड़ी उत्सुकता से उसकी तरफ देख रहे थे! लेखक बच्चों की तरफ देखता है और उनके पास जाता है  खड़े-खड़े ही उनसे कुछ देर बात करता है और अपनी डायरी में कुछ लिखता है! फिर पास की झोपड़ी में चूल्हे पर खाना पका रही महिला के पास जाता है 'चूल्हे के धुए से आपको बहुत तकलीफ होती होगी ,मैं समझ सकता हूं' लेखक वही बगल में पड़ी खाट पर बैठते हुए कहता है! सभी बच्चे लेखक को घेर कर खड़े हो जाते हैं! लेखक वहीं बैठे वृद्ध व्यक्ति से बातें करने लगता है और अपने बारे में बताता है उन्हें बताता है कि वह उनकी गरीबी पर एक किताब लिखने के लिए आया है! इतना सुनकर वृद्ध व्यक्ति के लबों पर एक अजीब सी मुस्कान बिखर जाती है! वृद्ध व्यक्ति मुसकुराते हुए कहता है आपसे पहले भी बहुत लोग आ चुके हैं हमारी गरीबी को कोरे कागज़ पर उतारने के लिए..! खैर, आपकी किताब के लिए जितनी मदद कर सकता हूँ वो करूँगा! लेखक साहब बातें करते करते अपनी डायरी पर कुछ पॉइंट लिख भी रहे थे! तभी एक 15-16 साल का दुबला पतला सा लड़का बच्चों के बीच से बाहर आकर लेखक सेे बोलता है अंकल क्या मैं कुछ पूछ सकता हूं? लेखक कहता है हांं क्यों नहीं !मैं आप लोगों से बातें करने और आप लोगों के बारे में जानने ही तो आया हूं ,बेझिझक पूछो जो पूछना है! 
अंकल हमारी बेबसी को कैमरे में कैद करके बहुतों की जिंदगी चमक जाती है तो फिर हमारी जिंदगी बेरंग ही क्यों रहती है? जब लोग हमारी गरीबी को कोरे कागज मात्र पर उतार कर अमीर और फेमस हो जाते हैं तो हम गरीब क्यों रह जातें हैं? मतलब जिसकी वजह से बहुत से लोग अमीर हो जाते हैं वो गरीब क्यों रहता है? यह सवाल सुनकर लेखक निशब्द हो जाता है और उसकी कलम वहीं की वहीं रुक जाती है.....! मानो उसके शब्दकोश में शब्द ही नहीं रह गए! 

32 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 07 दिसम्बर 2021 को साझा की गयी है....
    पाँच लिंकों का आनन्द पर
    आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. गरीबी को कोरे कागज मात्र पर उतार कर अमीर और फेमस हो जाते हैं लेकिन गरीब अमीर नही होते। मतलब जिसकी वजह से बहुत से लोग अमीर हो जाते हैं वो गरीब क्यों रहता है? मनीषा इस सवाल का जबाब आज तक कोई नही दे पाया है। बहुत सुंदर सृजन।

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  3. बड़ा ही उम्दा लेखन

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  4. बहुत ही हृदयस्पर्शी विषय उठाया है मनीषा । उत्कृष्ट और आंख खोलता आलेख । मैने भी इस पर कई रचनाएँ लिखी हैं ।

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  5. किसी की ग़रीबी पर कलम उठाकर या बेबसी को कैमरे में कैद करके बहुतों की जिंदगी चमक जाती है, पर उनकी ज़िंदगी में कोई बदलाव नहीं आता, क्योंकि इस दुनिया में हरेक को अपना रास्ता खुद ही बनाता पड़ता है

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    1. शायद आप ठीक कहर रहीं हैं..
      धन्यवाद आदरणीय🙏

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  6. निशब्द करता यथार्थ । हृदयस्पर्शी सृजन मनीषा जी ।

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  7. लाजवाब कर द‍िया इस वृतांत ने तो, वाह मनीषा जी

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  8. सत्य कडुवा होता है ...
    पर निःशब्द कर देता है अकसर ...

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    1. जी सर आप बिल्कुल सच कह रहे हैं सत्य कड़वा होता है और यह हर किसी के गले नहीं उतर सकता
      आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए बहुत होते हैं🙏

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  9. दिगम्बर जी ने सही कहा"सत्य कडुवा होता है ...
    पर निःशब्द कर देता है अकसर ..."
    लेखक हो या समाज सेवी ये सिर्फ खुद के लिए ये सब करते हैं। तुम ने बहुत ही गंभीर विषय पर चिंतन किया है। प्रिय मनीषा,तुम्हारी इस कहानी को पढ़कर मुझे भी एक सत्य कहानी याद आ गई है, समय मिला तो जल्दी ही साझा करूंगी। ढ़ेर सारा स्नेह तुम्हें

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    1. जी मैम मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं आप बिल्कुल सही कह रही है!
      सच कहूं तो यह कहानी लिखते हुए मुझे गिल्टी फील हो रहा था कि कहीं मैं भी तो नहीं कहानी के उसी लेखक की तरह...?
      आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद🙏

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  10. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  11. सफर में भीड़ तो होगी निकल सको तो चलो,
    मुझे गिरा के तुम संभल सको तो चलो

    बशीर बद्र साहब का ये शेर हमारे समाज की इसी सच्चाई को ब्याननन करता है।
    सदुर्भाग्य है मगर यही हो रहा हूं
    शानदार लेखन

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    1. धन्यवाद आदरणीय सर 🙏🙏🙏
      हमारे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है🙏

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  12. सच है और कड़वा सच है.

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  13. गरीब को अपनी किस्मत चमकाने के लिए दूसरे लेखक की जरूरत नहीं ...उसे अपनी किस्मत अपने हाथों लिखनी होगी...पर हाँ ये भी सच है कि ऐसी बस्तियों में लोग सिर्फ अपने स्वार्थ वश जाते हैं उनकी मदद के लिए नहीं।
    बहुत ही सारगर्भित सृजन है आपका
    बधाई एवं शुभकामनाएं।

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  14. गरीब और गरीबी कि बड़ी-बड़ी बातें कागजों पर छाप आते है कुछ करते क्यों नहीं हम
    मुरझायें चेहरे पर उम्मीदों से पत्थराई आंखे देख दिल से दुःखी होते है कुछ करते क्यों नहीं हम
    गुदड़ी में लिपटी जिन्दगी फुटपाथों पर देख वस उफ करते है कुछ करते क्यों नहीं हम
    हंसी आती है दरियादिली देखकर 5 रु में 5000 रुपये वाली पब्लिसिटी कि
    उम्मीद करते हैं पर कुछ करते क्यों नहीं हम।

    " नाव में जल और घर में धन भरे तो जितना जल्दी हो सके अंजुली से उपछीयें "
    मतलव सामर्थ्य अनुसार दान करते रहें।

    हमेशा कि तरह सत्य सटीक सार्थक रचना !

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  15. सचमुच निशब्द!
    समाज को आईना दिखाती सार्थक अभिव्यक्ति।
    सटीक दृश्य सटीक हृदय स्पर्शी सृजन।
    बहुत बहुत साधुवाद।

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रो रही मानवता हँस रहा स्वार्थ

नीला आसमां हो गया धूमिल-सा बेनूर और उदास,  स्वच्छ चाँदनी का नहीं दूर तक  कोई नामों निशान। रात में तारों की मौजूदगी के  बचें नहीं...