मैं आज आप लोगो को अपने गाँव की कुछ रूढ़िवादी विचारधाराओं से रूबरू करवाती हूँ ! हमारे गाँव में आज भी कुछ ऐसे बुद्धिजीवी लोग है जिनका मानना है कि महिलाएँ ज्यादा पढ़- लिख लेती हैं तो उनका दिमाग खराब हो जाता है वे हमारे यहाँ की परंपरा , रीत -रिवाजों , और संस्कारों को भूल जाती है । अपने पैर पर खड़े होते ही अपने से बडो़ की इज्ज़त करना भूल जाती है दरअसल इन बुद्धिजीवियों की समस्या ये है, इनको लगता है, कि जो ये कहते है और जो करते है सिर्फ वही सही है । यदि कोई औरत इनके विचारों पर अपने विचार रखती है तो इन को उसमें अपना अपमान नज़र आता है । इसलिए इन लोगो को स्याही वाले हाथ की उम्र में मेहंदी वाले हाथ भाते है ! कानून ने भले ही महिलाओं को हर क्षेत्र में जाने अधिकार दे रखा है पर हमारे यहाँ घर वाले और गाँव वाले ने सिर्फ मेडिकल, टीचिंग, पुलिस ,बैकिंग के ही क्षेत्रों में जाने का अधिकार दिया है! मैं आप लोगो को आज अपने गाँव की चाची जी के बारे में बताती हूँ जिनकी उम्र लगभग 40 के आस - पास है जो पहले गाँव में दिहाड़ी मजदूरी करती थी पर दो, तीन साल से एक सरकारी अस्पताल में काम करती है बस इसी बात से गाँव के लोगों के निशान पर रहती है मौका पाते ही कुछ लोग उनके चरित्र पर उंगली उठाने से नहीं चूकते हैं । और कहते है , "यैं रात रात भर अस्पताल मा रहत हीं इनके घरे खाना खाय वाला नाय है, पता नाय कतने जन से मुंह काला करावत हीं, ई मिहारू पूरे गाँव कैय नाक कटाय कैय तब दम ली! इन लोगों को गाँव की चिंता तब नही सताती जब एक औरत रात के दो बजे ही खेतों मे मर्दों के बीच काम करती है और तब भी जब तेज़ दोपहरी में काम करते करते पसीने में भीगने के कारण सारे कपडे़ बदन से चिपक जाते हैं जिससे खेत मे काम कर रहे लोगो के फूहड़ मजाक का सामना करना पड़ता है जब बोझा उठाते वक्त पल्लू को गिरने के कारण गंदी नजरों का शिकार होती है ! तब इन बुद्धिजीवियों को गााँव के इज्जत के साथ खिलवाड़ होता हुआ नज़र नहीं आता और अनहोनी की बू नहीं आती ! लेकिन जब एक औरत 7-8 किमी की दूरी पर एक अस्पताल मे काम करने जाने लगी तो ये बात गले नहीं उतर रही है और ये समाज उनके गलत हो जाने के डर से पतला होता जा रहा है ! कुछ महान लोगो ने तो उनसे सारे रिश्ते तोड़ लिए उनके यहाँ का पानी भी नहीं पीते हैं । क्योंकि वो रात के नौ - दस बजे काम से वापस आतीं हैं जो इनकी नजर मे गलत है हमारे यहाँ किसी की बेटी भाग जाती है तो उसकी सजा मां - बाप को मिलती है सजा के तौर पर उन्हें समाज से अलग कर दिया जाता है उनके यहाँ पानी तक नहीं पीते है . क्योंकि लोगों को लगता है कि यदि कोई उसके घर खाना खाता है या पानी पीता है सारा पाप उसके सर पर आ जाता है लेकिन यदि कोई पुरुष एक पत्नी के रहते हुए दूूसरी औरत ले कर आ जाए जो उनसे नीची जाति की ना हो ( दरअसल हमारे यहाँ आज भी ऊँच नीच का भेद भाव कायम है) तो बिना कोई सवाल किए सारे लोग स्वीकार कर लेते है । जब यही काम कोई महिला करती है तो उसे समाज से अलग कर दिया जाता है मुझे समझ नहीं आता जो काम महिलाओं के लिए गलत है वो पुरुषों के लिए सही कैसे हो जाता है ? क्या काम का भी जेंडर होता है ? जो चीज गलत है मतलब गलत है वो किसी एक के लिए सही कैसे हो सकती है ?ये तो वही बात हुई तुम करो तो रासलीला और हम करे तो कैरेक्टर ढीला! जो काम गलत है वो हर किसी कर लिए गलत होता है किसी एक के लिए सही नहीं हो सकता! क्योंकि सत्यनारायण की कथा कहने वाले पंडित जी यदि मंत्र की जगह अगर गाली देते हैं तो वो मंत्र नहीं हो जाती !गाली ही रहती । या मस्जिद मे कुरान पढ़ने वाले मौलवी नवाज़ की जगह अशब्द का इस्तेमाल करे तो वो शब्द पाक नहीं हो जाता वो अशब्द ही रहता है ठीक उसी तरह गलत काम गलत ही रहता है फिर करने वाला चाहे कोई भी हो । हमारे यहाँ आज भी महिलाएं साड़ी के सिवा कुछ और नहीं पहन सकती । क्योंकि ऐसा करने पर हास्य , तंज भरी निगाहों और व्यंग्य के चुभते बाड़ों का सामना करना पड़ता है लेकिन पुरुषों के साथ ऐसा कुछ भी नहीं होता , वे तो बहुत पहले ही ' आधुनिक हो चुकें है बड़े - बूढ़े भी पैंट -शर्ट और वरमूडा पहनते है लेकिन महिलाएँ अगर सलवार -कुर्ता भी पहन ले तो इन्हे रास नहीं आता है लेकिन साड़ी में आधा बदन भी दिखे तो भी स्वीकार है । यहाँ महिलाओं के लिए बदलाव कछुआ की तरह रेेंगते हुुए आता है पर पुरुषों के लिए चीते की रफ्तार से! यहाँ यदि 14 साल का लड़का बुलेट जैसी वजनदार बाइक पर फर्राटे भरता तो समाज ,कानून किसी के भी कान पर जूं तक नहीं रेंगती लेकिन जब एक 40 साल की महिला खुद की कमाई से गाड़ी खरीद कर ड्राइविंग लाइसेंस साथ लेकर गाड़ी चलाए तो ये बात इनके गले नहीं उतरती उसके बिगड़ने की चिंता में समाज अवसाग्रस्त होता जाता है! जिसके चलते दिन प्रति दिन पतला होता जाता है!
कुछ पंक्तियाँ हमारे समाज के महान लोगो के लिए-
इन नाजुक हाथों से
जिस दिन कलम की तेज धार निकलेगी,
जिस दिन रिश्तों का लिहाज़ किये बिना,
खुल कर रूढ़िवादी विचारधारा पर प्रहार करेगी,
शराफ़त की नकाब ओढ़ कर बैठे हैं,
जितने शरीफ़जादे ,
उनके चेहरे बेनकाब करेगी!


