सोमवार, 3 मई 2021

सफर जिंदगी का

 जिन्दगी भी अब मेरे साथ इन्सानो की तरह खेल, खेल रही है,

ना साथ छोड़ रही है ना ही ठीक से साथ निभा रही है!
जिन्दगी और मौत की इस लडा़ई को, 
मैं अकेली लड़ रही हूँ
जिन्दगी के इस सफर में अकेली पड़ रही हूँ!
बेज़ुबा की आवाज बन कर, 
उनके हिस्से की लडा़ई लड़ने की चाह थी,
पर आज खुद चुप चाप जिन्दगी और मौत की लडा़ई लड़ रही हूँ!
लोगों की की मदद करने की चाह थी, 
पर आज खुद मदद के पात्र बन रहीं हूँ
 अब तक मेरे विचारो का मजाक बनता था , 
पर अब जिन्दगी मेरा मजाक बना रही है!
जो कभी प्यार से गले लगाया करती थी,
वही हमारे अपनो की तरह ,
गले लगा कर खंजर घोपने का,
पीठ पीछे षड़यंत्र रच रही है!
छोटी छोटी मुसिबते, 
अपनों में छुपे गैरों के चेहरे बेनकाब कर रही है! 
छोटी सी जिन्दगी, अनुभव बड़े दे रही है,
और मै इस दर्द भरे एहसास और अनुभव को,
अपने शब्दों में पिरो कर कोरे कागज पर उतार कर, 
इस दर्द को कम करने की कोशिश कर रहीं हूँ! 
रूठी है किस्मत,मगर हिम्मत है हारी नहीं!
इतनी आसानी से हालत के आगे, 
मैं घुटने टेकने वाली नहीं! 

27 टिप्‍पणियां:

  1. हिम्मत हारना और हालात के आगे घुटने टेकना इंसान का काम है भी नहीं मनीषा जी। रही बात ग़ैरों के चेहरों की तो वे तो मुश्किलात में बेनक़ाब होने ही होते हैं और यह हमारे लिए अच्छा ही होता है कि अपनों और ग़ैरों की ठीक-ठीक पहचान हो जाए। आप हौसला बनाए रखिए। दिल की बात जिस तरह से आपने इस पोस्ट में कह दी है, इसी तरह कह दिया कीजिए। और कुछ नहीं तो इससे अपने अंदर की घुटन ही बाहर निकलती है।

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    1. धन्यवाद सर,🙏🙏 सच में मुसिबतों के आने पर लोगों की असलियत सामने आती हाँ तकलीफ तो बहुत होती है पर सच्चाई सामने आने की खुशी भी होती! मेरी कोशिश रहती है कि यदि कोई मुझे दर्द दे तो उस दर्द को भी मैं अपनी रचनाओं से इतनी खूबसूरती से व्यक्त करूं कि लोग मुझे दर्द देने से भी डरे ये सोच कर कि इसे हम एक विषय दे रहे हैं इसके काम के लिए!

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    2. मैं जितेंद्र जी की बातों से पूरी तरह सहमत हूँ मनीषा ,वैसे भी अभी तो आपके जीवन की शुरुआत हुई है अभी तो बहुत कुछ देखना समझना बाकी है बच्चें। दिल की बात को शब्दों में ढालकर दर्द निकल दिया,अब मिट्टी डालो और दफन कर दो और एक नई सोच,नई चेतना के साथ आगे बढ़ो।
      कोई भी तुम्हे दर्द नहीं दे सकता जब तक तुम खुद से प्यार करती रहोगी। ऐसे ही लिखते रहो और आगे बढ़ो,ढेर सारा स्नेह तुम्हे

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    3. जिंदगी के खेल हमें कब समझ आए हैं, हम तो केवल वही करते हैं जैसा वह चाहती है, एक समय बचपन में हम खेलते थे तब खेल भी हमारे थे और जीवन भी हमारा, लेकिन जब उम्र का सफर चलता है तब जिंदगी खेलती है लेकिन हम केवल उसका अनुसरण कर सकते हैं, सीखना भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। अच्छी रचना है, मन से निकले हुए शब्द।

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    4. आप सभी का बहुत बहुत आभार और तहेदिल से 🙏🙏🙏🙏

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुघवार 05 मई 2021 को साझा की गयी है.............. पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (5 -5-21) को "शिव कहाँ जो जीत लूँगा मृत्यु को पी कर ज़हर "(चर्चा अंक 4057) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    कामिनी सिन्हा

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    1. हमारी रचना को चर्चा में सामिल करने के लिए तहेदिल से धन्यवाद मैम🙏💕🙏💕

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  4. दर्द को भी जो दवा बना लेता है, उसे कौन हरा सकता है भला, आज सभी तो डरे हुए हैं, इसलिए किसी से बेशर्त प्रेम की उम्मीद ही नहीं रखनी चाहिए।

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  5. हालात बदल भी जाते हैं ... और इस बात पर विश्वास का बने रहना भी बहुत जरूरी है ... दर्द की दावा हिम्मत देती रहती है ... सुन्दर रचना है ...

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  6. अथाह दर्द समेटे है आपकी ये अभिव्यक्ति।
    जिंदगी बहुत बार ऐसे आईने दिखाती है, बस अंतिम पंक्ति की तरह दृढ़ता से डटे रहिए।

    इतनी आसानी से हालत के आगे,
    मैं घुटने टेकने वाली नहीं!

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    1. कोशिश यही है कि दर्द को भी दवा बना लू, अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बना लू! धन्यवाद🙏💕🙏💕

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  7. संघर्ष ही जीवन है ।।
    सुंदर प्रस्तुति

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  8. अपने सुंदर और सुकोमल भावों की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति, बहुत शुभकामनाएँ।

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  9. रूठी है किस्मत,मगर हिम्मत है हारी नहीं!
    इतनी आसानी से हालत के आगे,
    मैं घुटने टेकने वाली नहीं!
    बहुत ही उम्दा जज़्बात। भगवान यही हौसला बनाए रझे!!!

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    1. आपका बहुत बहुत धन्यवाद और आभार सर🙏🙏🙏🙏 🙏🙏

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