शनिवार, 8 मई 2021

माँ

वो पहाड़ सी  मजबूत है, 
है फूल -सी वो कोमल! 
वो करुणा की है मूरत, 
जिसके आगे , 
है फीकी सारी सूरत! 
थोड़ी नासमझ और बहुत ही मासूम है, 
ठंडी में आंगन की सुनहरी धूप है! 
सूरज की तपती दुपहरी में ,
वो तरूवर की छांव है!
मुस्कान उसकी अध खिले फूल- सी, 
गहरी है वो समंदर -सी, 
नाजुक है वो ओस- सी
युध्द के क्षेत्र में ,  
चमकती तलवार सी ! 
अंधियारों में चिराग सी, 
अडिग है चट्टान सी
शब्दों में नहीं कर सकते बयां 
ऐसा उसका प्यार है
उसकी सबसे अलग है पहचान ! 
वो  इस संसार में ,
और उसी से संसार! 
माँ से  ही होता है, 
इस सृष्टि का निर्माण! 
माँ के चरणों को शत्-शत्  प्रणाम!





11 टिप्‍पणियां:

  1. अत्यंत सुंदर, हृदयस्पर्शी एवं सराहनीय रचना। अभिनंदन।

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    1. आपका बहुत बहुत धन्यवाद और आभार सर 🙏🙏

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  2. रचना अच्छी है पर मुझे प्रतीक रुप में मां के लिए सर्प सही नहीं लगा। वैसे रचना अच्छी है ।

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    1. हां मैम मुझे भी सही नहीं लग रहा था पर अब सुधार कर लिया!
      आपको तहेदिल से धन्यवाद🙏💕

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    2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. शुक्रिया मनीषा, मेरे सुझाव को इतनी उदारता से लेने के लिए। अब रचना का सौंदर्य चौगुना बढ़ गया है ।मां पहाड़ सी ही होती है ।उसका अस्तित्व विराट है पर वह भीतर से पुष्प सी ही सुकोमल है। यूं लिखती हुई। यश बटोरती रहो। मेरी शुभकामनाएं और प्यार 🌷🌷❤️❤️

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    1. मैम,आपको तहेदिल से धन्यवाद!
      आपकी ये बात मुझे बहुत अच्छी लगती है कि आप बेजिझक हमारी कमियों से हमें अवगत करती है! जोकि बहुत कम लोग ही करते हैं सामने तारीफ करने में सब माहिर होते है पर मुंह पर कमियाँ बताना में बहुत कम! इस लिए आपको तहेदिल से धन्यवाद🙏💕🙏💕🙏💕🙏💕🙏💕🙏💕

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  4. बहुत बहुत सुन्दर सराहनीय रचना |

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