मंगलवार, 28 सितंबर 2021

जीवित वृद्धजनों को सम्मान व प्यार दो तो बात बने!

तस्वीर गुगल साभार से
मेरे जेहन में पितृपक्ष मैं हो रही श्राद्ध को देखकर कुछ सवाल उठ रहे हैं कि जब लोग अपने घर के बुजुर्गों से इतना प्यार करते हैं कि उनकी याद में पितृपक्ष में प्रीतिभोज का आयोजन करते हैं और  उनके आगमन के लिए चौखट को फूलों से सजातें हैं! तो फिर वृद्धाश्रम क्यों खुले होते हैं हमारे शहर में क्या जरूरत ? मैं ये नहीं कहती कि  पितृपक्ष में ऐसा ना करें, बिल्कुल करें,शौक से कर लेकिन जब जीवित रहें तब भी इतना ही प्यार और सम्मान दे तो अधिक बेहतर होगा! और तब यह सब भी शोभा देगा! क्योंकि मरने के बाद वह इंसान देखने नहीं आता है कि कौन मुझे कितना प्यार कर रहा है ! सिर्फ समाज और दुनिया देखती है, कुछ लोग तो दिखावे के लिए ही करते हैं बात कड़वी है पर सच है! देखा है मैंने उन लोगों को पितृपक्ष में श्राद्ध पर बहुत बड़ा प्रीतिभोज का आयोजन करते हुए जो घर के बुजुर्गों के जीवित रहने पर उन्हें घृणा भरी नजर से देखते थे !और ताने पे ताने  सुनाते रहते थे खासकर घर की महिलाएं  शहर में तो वृद्ध आश्रम भेज देते हैं लेकिन गांव में  बुजुर्ग दंपत्ति को दो टुकड़ों में बांट दिया जाता है बड़े के पास पिता, तो छोटे के पास माँ और जिनके यहाँ एक ही वृद्ध व्यक्ति होता है! उसे एक महीना बड़े बेटे के पास, तो एक महीना छोटे बेटे के पास रह कर! ऐसे करके बची हुई जिंदगी गुजारनी पड़ती है! जिन बुजुर्ग दंपत्ति के पास एकमात्र सहारा होता है! उनकी जिंदगी तो और भी दर्द भरी हो जाती है! जब तक जीवित होते हैं फूटी आंख भी नहीं भाते हैं खासकर औरतों को जो एक भी मौका नहीं छोड़ती हीनता का भाव  महसूस कराने में बुजुर्गों को, और का बात-बात पर ताने मारती रहती है कि इनकी वजह से हमारी रातों की नींद हराम हो चुकी है पूरी रात सिर पर ही खाता रहता है! बुड्ढा नींद  भी नहीं आती है इसे, अरे! नींद आय भी कैसे, पूरा दिन पड़े पड़े बस पलंग तो तोड़ता रहता है! जब कुछ काम धंधा करेगा तब नींद आएगी !ऊपर से पूरा दिन बड़बड़-बड़बड़ करता रहता है हर काम में बस नुक्स निकालता रहता है! आदि बहुत कुछ सुनाती रहतीं हैं! ऐसी बातें करने वाले और वे लोग जो घर में वृद्ध जन के होने पर मेहमानों के सामने शर्म महसूस करते हैं! उन्हीं को मैंने पितृपक्ष में बुजुर्गों के श्राद्ध पर मेहमानों को शौक प्रीतिभोज निमंत्रण भेजते हुए देखा है! मुझे समझ नहीं आता कि इन्हें,उन्हीं बुजुर्गों के  श्राद्ध पर मेहमानों को बुलाते हुए शर्म नहीं आती? तब शर्म नहीं महसूस होता ? जब तक जीवित थे तब तो बहुत शर्म महसूस होता था! तो फिर ये दिखावा किस लिए करते हैं? जबकि सबको पता होता है कि बाप के जीवित होने पर कितने खुश थे यह लोग! यह लोग एक बार भी यह क्यों नहींं सोचते इसका असर उनके बच्चों पर कैसा पड़ेगा अगर यह ऐसा करेंगेे तो बच्चे भीी तो इन्हीं से सीखेंगे इन्हीं की तरह जीवित रहने पर कद्र नहीं करेंगे और मरणोपरांत धूमधाम से श्राद्ध करेंगे! 
पितृपक्ष में श्राद्ध करने से अधिक महत्वपूर्ण है घर के  जीवित बुजुर्गों को प्यार सम्मान देना ! जिस उम्र में सबसे ज्यादा व्यक्ति अकेलापन महसूस करता है उस उम्र में उसे  अपनेपन का एहसास करा कर खुश रखना! 

13 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल सही कहा मनीषा की श्राद्ध करने से ज्यादा जरूरी है जीते जी बुजुर्गों की देखभाल करना और उन्हें सम्मान देना।

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    1. आपका तहेदिल से धन्यवाद आदरणीय मैम🙏🙏🙏

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  2. बहुत ही गहन और जरूरी विषय पर लेखन...। खूब बधाई...

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  3. भोजन चाहे जैसा हो अंत में चलने वाला मिष्ठान always मीठी ही होती है।
    जीवन के अंत में प्रीतिभोज और भोज के बाद श्राद्ध कर्म उस मिष्ठान कि तरह ही होती हैं ।

    ज्यादा विचलित होने आवश्यकता नहीं हमारा समाज वर्षों से ऐसा ही है !

    बहुत सुन्दर एवं भौतिक विषय !

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    1. आप बिल्कुल सही कह रहे हैं सर!
      प्रतिक्रिया के लिए आपका तहे दिल से धन्यवाद

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  4. काफी कुछ ऐसा ही देखने को मिलता है. कई कारण हैं जिनमें से एक है बुजुर्गों के पास पैसे की कमी, पेंशन का ना होना. चिकित्सा सुविधाओं की कमी और बच्चों पर निर्भरता भी एक बड़ा कारण है. बुजुर्गों के प्रति एक आम लापरवाही जो 'जनरेशन गैप' की वजह से होती है अब बढ़ती जा रही है. आसान उपाय है नहीं. श्राद्ध इसका एक तोड़ था पर अब मात्र औपचारिकता रह गया है.

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