रविवार, 28 फ़रवरी 2021

ईश्वर ,अल्लाह और गॉड?

Manisha Goswami कहते हैं इस पूरे श्रृष्टि का निर्माण सर्वशक्तिमान ईश्वर ने किया है , तो हर इंसान का निर्माण भी उन्हीं ने किया है
तो जाहिर सी बात है मनुष्यों के अंदर होने वाली सारी गतिविधियां भी उन्हीं की देन है, तो फिर किसी की खतरनाक सोच और हैवानियत भी उनकी देन हैं. तो फिर कोई इंसान बुरा होता है तो हम उसे गलत क्यों   कहते हैं? क्योंकि उसकी खतरनाक सोच भगवान की देन है.और भगवान की कोई चीज गलत नहीं हो सकती.
कहते हैं भगवान की मर्जी के  बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता  तो फिर हत्या, हैवानियत, चोरी आदि भी उनकी मर्जी से होतें होगें? इससे उनका मनोरंजन होता होगा? तभी तो चुप चाप एक देखते रहते हैं, या फिर जिसे सब सर्वशक्तिशाली कहते हैं उसकी हकीकत कुछ और है?या तो वो सर्वशक्तिशाली नहीं  है? या तो अति निर्दयी है?और जब कोई गलत काम करता है तो ये भी भगवान की मर्जी से होता है तो फिर दोषी को सजा सुुुना  कर सुप्रीम कोर्ट भगवान के खिलाफ काम करती है. क्योंकि इंसान तो भगवान की कठपुतली है जो उनके इसरो पर नाचता रहता है. दोषी नेे उन्हीं के इसारे पर काम किया , तो फिर किसी की नजरों में वो गलत कैसे हो गया? कहते हैं भगवान के सारे काम सही  होतें हैं तो दोषी भी सही और सुप्रीम कोर्ट भी.जब दोनों सही है तो फिर सजा क््यों? क्योंकि ये भगवान ने उससे करवाये हैं तो असली गुनेहगार तो भगवान है.और हाँ भगवान, अल्लाह  और गॉड  शक्तिशाली हैं तो फिर इन मंदिर और मस्जिदों की रखवाली ये मामुली इंसान क्यों करता है?  क्या भगवान इतने आलसी हैं कि अपने घर की रक्षा खुद नही कर सकते? 
उस समय  भगवान , अल्लाह और गॉड कहाँ चले जाते हैं? जब कोई ढोगी उनके नाम से लोगों को लूट रहा होता है और उनके ही दरबार में किसी के जिस्म से अपनी प्यास बुझाता है. क्या इतने बेशर्म और निर्दयी होतें हैं भगवान? तो फिर इनकी पूजा क्यों करते हैं लोग?
 
कहाँ चले जाते हैं  प्रेमियों के मार्गदर्शक सांवरिया कृष्ण उस वक्त जब कोई व्यक्ति प्यार के नाम पर किसी मासूम के जिस्म को अपना निसाना बना रहा होता है और अपने जिस्म की प्यास बुझा रहा होता है?कहते हैं इंद्र देव का मिज़ाज रंगीन था ! एक बार इंद्र धरती पर अपनी पत्नी इंद्राणी के साथ आये थे, और इंद्राणी को प्यास लगी वे इंद्राणी को वहीं बिठा कर एक गाँव में गए उंहें गाँव में एक खूबसूरत कन्या (उदंती ,जो वर्तमान में छत्तीसगढ़ में उदंती- सीतानदी रिज़र्व के रूप में स्थित है) को देख कर उनका मन मचल जाता है और उस पर मोहित हो गए ! और उन्हें इंद्राणी का खयाल ही नहीं रहा! तो आप लोग बताइये कि क्या ऐसे चरित्रहीन व्यक्ति को पूजना चाहिए ?जिसे पतिधर्म का पालन करना भी नहीं आता है.
ये विचार भी उन्हीं की देेन है ?क्योंकि पूरे श्रृष्टि का निर्माण उन्हीं ने तो किया है.ईश्वर तो सर्वशक्तिशाली है तो फिर क्यों नहीं अपने शक्ति से इनके मन को स्वच्छ् कर देते? क्या इस लिए नहीं करते कि इससे उनका मनोरंजन
होता है? या तो भगवान अति कमजोर है या फिर भगवान सिर्फ भर्म है ?कहते हैं कि शिवलिंग पर चढ़ाया गया गंगा जल को जिस जगह पर डाल देते हैं वो जगह  पवित्र हो जाती है और अपवित्र इंसान को भी पवित्र करने की क्षमता रखता है तो फिर मासिक धर्म के वक्त महिला के छूने भर से ये अपवित्र कैसे हो जाते हैं?
क्या कोई आस्तिक है जो भगवान की पूजा निस्वार्थ भाव से करता है या भगवान को बिना किसी अपेक्षा के मानता है? सब भगवान को सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए मानते हैं और पूजा करते हैं अगर बिना अपेक्षा के करते हैं तो उसमें भी स्वार्थ छुपा होता है क्योंकि पूजा करने से खुशी और शांति मिलती है तो हुआ न स्वार्थ! 
 है कोई भगवान और अल्लाह, गॉड का सच्चा भक्त जो इन सवालों का उत्तर दे सकता है??????????????????????????????????? 
                                 काश! 
काश!मंदिरों में छप्पन भोग लगाने की बजाय, भूखे को भोजन खिलाने की पंरपरा होती !
तो मंदिर की चौखट पर भूखे बच्चे नज़र  ना आते! 
काश! पीर बाबा पर चादर चढ़ाने के बजाय जरूरतमंद को वस्त्र भेट करने की पंरपरा होती,तो ठंडी से ठिठुर कर किसी की मौत ना होती!
काश ! भागवत - भंडारा कराने के बजाय
गरीबों के बच्चों के सपने पूरे कराने की पंरपरा होती तो किसी के सपनों की हत्या ना होती! 
काश! मंदिर ,मस्जिद बनाने के बजाय बेघरों के सर पे देने की पंरपरा होती तो आज कोई बेघर ना होता! 
काश !लोग धर्मवाद, जातिवाद करने के बजाय, मानवतावाद करने लगते तो आज धर्म के नाम पर अधर्म नहीं हो रहें होते!                                                    -मनीषा गोस्वामी
           
                                                                    
                       

26 टिप्‍पणियां:

  1. सहमत हूं आपके विचारों से । भगतसिंह के भी यही विचार थे । ऐसे विचारों की तो अभिव्यक्ति ही अत्यंत साहस का कार्य है । आपने यह साहस किया, इसके लिए आप आदर की पात्र हैं ।

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    1. हमारे विचार को समझने और उसकी कद्र करने के लिए तहेदिल से धन्यवाद! हम आपके आभारी हैं!

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  2. प्रिय मनीषा , निशब्द हूँ आपका लेख पढ़कर | लिखती रहिये | मेरी हार्दिक शुभकामनाएं|

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  3. आप को तहेदिल से धन्यवाद! 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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  4. पेरियर का कथन सत्य है -" नास्तिकता के लिए बड़े साहस और दृढ विश्वास की आवश्यकता होती है,ये स्थिति भी उन्ही के लिए संभव है जिनके पास तर्क तथा बुद्धि की शक्ति हो "
    और यकीनन आप में ये गुण है मनीषा जी। अभी आप बहुत छोटी है फिर भी आपने अपने तार्किक बुद्धि से ये बात सिद्ध कर दी कि -" या तो भगवान अति कमजोर है या फिर भगवान सिर्फ भर्म है ?"
    मेरा आप से सिर्फ एक सवाल है -आप इतना तो मानती ही होगी कि -माता-पिता हमारे जन्म देने के निमित बनते है परन्तु क्या वो अपनी सारी समझ-बुझ और शक्ति लगाकर भी बच्चों को सही संस्कार या यूँ कहे सही इंसान बनाने में सक्षम हो पाते है ?
    एक बात पर और गौर कीजिए -"कल को आप भी माँ बनेगी और यदि आपको ये शक्ति मिल जाए कि -आप अपने बच्चों का भविष्य लिख सकती है तो क्या गलती से भी आप अपने बच्चों के भविष्य में दुःख-दर्द लिखेगी।"यकीनन आपका जबाब -"नहीं" होगा। तो यदि हम परमात्मा को सर्वशक्तिमान मानकर उन्हें अपना परमपिता मान भी ले तो ये परिकल्पना भी अजीब लगेंगी कि -हम इंसान होकर भी अपने बच्चों के भाग्य में दर्द नहीं लिख सकते या उन्हें दर्द नहीं दे सकते है तो उस परमपिता को क्या ख़ुशी मिलेगी हमें दर्द देकर।
    आपकी बुद्धि बड़ी तार्किक है मेरी राय में आप अपनी बुद्धि का उपयोग ये जाने में करें कि-जो ये सारी बातें (जिनका जिक्र आपने किया है )भ्रम रूप में तो नहीं फैलाई गई है। ये सारी बातें धर्म के ठेकेदार अपना उल्लू सीधा करने के लिए तो नहीं फैला रखे है। यदि इस पर भी आपका मन ना मानें तो आप शुद्ध नास्तिक ही बन सिर्फ अपना सच्चा कर्म कीजिय जो मानवता के लिए हो। यकीनन ये ऐसे आस्तिक (जिनका जिक्र आपने किया है )होने से ज्यादा सुखद और अच्छा है। ढेर सारा स्नेह आपको अपनी विचारों को निर्भीकता से साझा करने के लिए।

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  5. आदरणीय मैम! आपने इसे साहस कहा बाकी लोग तो दू साहस कहते हैं!आपने अपना किमती वक्त निकाल कर मेरे लेख को पढ़ा और अपनी राय व्यक्त की और मेरा हौसला बढ़ाया इतना सारा प्यार देने के लिए तहेदिल से आपको धन्यवाद🙏💕🙏💕🙏💕🙏💕🙏💕

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  6. मनीषा जी बहुत अच्छा लेख लिखा आपने।

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  7. ईश्वर के लिए इंसान ही नहीं सभी जीव समान हैं, वे किसी से कोई भेद नहीं करते, उसे कोई माने या न माने यह उस पर निर्भर है
    इंसानों को इसलिए विवेक दिया है कि वे अपना अच्छा बुरा देख जीवन व्यतीत करें, कर्म करें

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  8. प्रभावी आलेख।
    आपके विचारों से सहमत।

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  9. और कोई हो न हो, मैं आपकी बात से सहमत हूँ । कड़वा सच गले उतारना हर किसी के बस की बात नहीं । लेकिन ऐसे कड़वे सच को कह देना भी आज के ज़माने में बड़ी हिम्मत का काम है । आपमें यह हिम्मत है, देखकर अच्छा लगा । इस हिम्मत को टूटने न दीजिएगा ।

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  10. ईश्वर है या नहीं, इस पर अनादिकाल काल से बहस चली आ रही है ! दोनों पक्षों के पास अपने-अपने तथ्य हैं ! कारण हैं ! अपने-अपने विद्वान हैं ! उनकी अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं ! पर दुनिया की अधिकतम आबादी किसी ना किसी शक्ति पर विश्वास जरूर करती है ! बहुत बड़े प्रतिशत का मानना है कि कुछ तो है जो कायनात को कायम रखे हुए है ! यदि हम बिना किसी पूर्वाग्रह के खुद का विश्लेषण करें तो शायद पाएं कि हम शायद अपने परिवेश, अपनी परिस्थितियों, अपने हालात के चलते अपना मन बना बैठे हैं ! ऐसा भी हो सकता है कि हमने पूरी तरह, गहरे पैठ कर जानकारी हासिल ना की हो ! पूरी तरह से अध्ययन न कर अपनी धारणा बना ली हो ! हर चीज का सिर्फ एक पहलू ही समझ अपना मत स्थिर कर लिया हो ! किसी घटना को अपने नजरिए से देख अपना फैसला ले लिया हो ! दुनिया के घटनाक्रम को देख छोटी उम्र में ऐसे सवाल उठना वाजिब हैं। प्रसंगवश आपको बताता चलूँ कि ऎसी ही मन:स्थिति में मेरे द्वारा भी हमारी कथाओं में वर्णित कुछ घटनाओं पर उनके विरुद्ध लिख दिया गया है ! पर इसका मतलब यह नहीं कि मुझे सर्वोच्च सत्ता पर शंका है। मेरे कहने का अर्थ यह है कि सिर्फ कुछ लोगों के विचार पढ़-सुन, बिना गहराई से अध्ययन किए बगैर अपनी धारणा नहीं बना लेनी चाहिए ! अपने विवेक का उपयोग बहुत जरुरी होता है ! वैसे आपका प्रयास सराहनीय है ! कभी फिर इस विषय पर खुल कर बात करने का मौका देखते हैं।

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    1. बिलकुल! किसी के भी विचार को बिना तर्क किये स्वीकार करना बहुत बड़ी मूर्खता है,फिर वो किसी महान व्यक्ति या मामुली व्यक्ति के हो! यदि आप के विचारों को मैं बिना अपने विवेक और तर्क प्रयोग किये स्वीकार कर लूँ तो मूर्खता होगी! और यदि आप मेरे विचार को बिना तर्क के स्वीकार बिना अपने तर्क के स्वीकार करें तो मूर्खता होगी!

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  11. जब हम पूर्णतः आस्था के साथ जीवन जी रहे होते हैं और अपने अवलम्बन(ईश्वर)से अटूट विश्वास के साथ जुड़े होते हैं तब किसी भी तरह की अनहोनी में हम ईश्वर से अपेक्षा रखते हैं किसी चमत्कार की...लेकिन परिस्थितियाँ जब हमारे अनुकूल नहीं होती तब ऐसे भाव आने स्वाभाविक हैं....उम्र के साथ जब स्वयं की शक्तियों और मजबूरियों से वाकिफ होते हैं तो समझ आता है कि ईश्वर भी हर जगह चमत्कार क्यों नहीं कर पाते....। वैसा क्यों नहीं करते जैसा हम चाहते हैं सोचते हैं और जो उचित भी है...।
    आपके तर्कपूर्ण सुन्दर लेख हेतु बधाई एवं शुभकामनाएं।

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  12. मेरे ब्लॉग पर आने का धन्यवाद! यहां आपकी पोस्ट से यह जानकर खुशी हुई कि हम लोग एक जैसे लोग है! मेरा मानना है कि एक जैसे लोगों को अब साथ मिल कर काम करना चाहिए!

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