मंगलवार, 9 नवंबर 2021

संघर्ष-ए-जिंदगी


कहते हैं कि दुख के बाद सुख आता है पर अनुभव कुछ और ही कहता है! 
यह कहानी एक ऐसी औरत की है जिस की जिंदगी में दु:ख के बाद सुख नहीं आया बल्कि और भी बड़ा दुख आता रहा, जिसके पति ने उसे कभी वह इज्जत नहीं दी, जो एक पति को अपनी पत्नी को देना चाहिए! पर उसी पति की वजह से नात-रिश्तेदार में थोड़ी इज्जत मिलती थी! उनके पति शिक्षामित्र थे, इसलिए अनपढ़ होने पर भी लोग उन्हें मास्टराइन (मास्टरनी जी) कहकर बुलाते थे! मुझे ठीक से तो नहीं पर इतना याद है कि एक बार जब कुछ छात्राएं अपने अध्यापक की पत्नी यानी की उस महिला से न चाहती थी तो किस तरह उनके घर के कुछ लोगों ने उन्हें, उनके पति की पत्नी के रूप में परिचय ना करा कर,उनके पति की भाभी को पत्नी के रूप में परिचय कराया छात्राओं से! सिर्फ इसलिए क्योंकि वो उतनी खूबसूरत नहीं थी जितनी कि उनकी जेठानी! लेकिन एक बार भी किसी ने नहीं सोचा कि उन पर क्या बीतेगी! और उन्होंने इस बात का विरोध भी किया पर उंगलियां उन्हीं पर उठाई गई! सालों घरेलू हिंसा का शिकार होती रहीं ये सोच कर कि एक दिन उनका दिन भी आएगा! कितनी मार उनको पड़ती थी! उनके छोटे छोटे बच्चों के सामने उन्हें कैसे जलील किया जाता था ! मुझे याद है किस तरह एक बार जब उनके पति रात को शराब के नशे में उन्हें पीट रहें थे तब उन्होंने एक ऐसी गलती कर दी जो उन्हें नहीं करनी चाहिए थी! इस बात के लिए सभी ने उन्हें जलील भी किया और उसकी गलती का एहसास भी कराया और वो अपनी गलती पर शर्मिंदा भी थी! कुछ दिनों तक घर से बाहर भी नहीं निकलीं! लेकिन उनके पति को कभी भी उनकी गलती का एहसास नहीं कराया गया जोकि उनकी गलती की तुलना में बहुत ही बड़ी गलती थी! कराते भी कैसे क्योंकि सदियों से चल आया है कि अगर कोई गलत काम पुरुष करें तो उस पर उतनी उंगलियां नहीं उठती जितनी की एक महिला के गलती करने पर उठती! मुझे ठीक से तो नहीं पर थोड़ा बहुत याद है कि किस तरह वह अपनी मानसिक स्थिति खो बैठी थी दूसरे बच्चे के पैदा होने के बाद बच्चे की नाजुक स्थिति देख कर! जिंदगी भी कैसे-कैसे खेल खेलती है जिसे कुछ दिन पहले लोग हाफ माइंड कहते थे वो सच में पागल होने की स्थिति में थी! कुछ समय बाद जब उनकी हालात में थोड़ा सुधार आया और सब कुछ नॉर्मल होने लगा तभी उन्हें अपने पति का किसी दूसरी महिला से अवैध संबंध के बारे में पता चला! तो उन्होंने विरोध करना शुरू कर दिया पर फिर से उंगलियाँ उन्हीं पर उठाई गई! कोई कहता था कि इनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है इसलिए यह कुछ भी बकती रहती है लेकिन पता सबको था कि उनके पति का किसी अन्य महिला से अवैध संबंध है! लेकिन सभी लोग उनकी गलतियों को छुपाने के लिए कहते कि जब चोर को सेंध काटते पकड़ो तब उसे चोर कहो! लेकिन जब उन्होंने यह बात साबित कर दी कि उनके पति का किसी और के साथ नाजायज रिश्ता है! तब भी सभी लोग उनके पति के बचाव में ही लगे थे और कह रहे थे कि तुम्हें तुम्हारा खर्चा मिल ही जाता है तो तुम्हें दुनियादारी से क्या मतलब तुम अपने काम से काम रखो तुम्हारे पति कहां जाते हैं,क्या करते हैं इससे क्या लेना देना तुम्हारा! अगर तुम्हारी जरूरत ना पूरी हो तो शिकायत करो! 
पर ये राय देने वाले लोगों के साथ जब ऐसा कुछ होता तो क्या वे चुप रहते हैं? उन्हें बिल्कुल भी बुरा नहीं लगता चुपचाप सब कुछ सहते रहते?और अगर किसी औरत को सच में फर्क नहीं पड़ता कि उसका पति क्या करता है ,किस से उसका क्या संबंध है, उसे सिर्फ अपने खर्चे और पैसों से मतलब है तो ऐसी औरतें मतलबी होते हैं जिन्हें सिर्फ और सिर्फ पैसों से प्यार होता है और किसी चीज से कोई मतलब नहीं! कुछ दिन बाद जब उस महिला से अपने पति को छुड़ा पायीं! और सब कुछ नॉर्मल हो गया! लेकिन अब वो पहले जैसी नहीं रहीं, अब वो हर बात को नकारात्मक नजरिए से देखती थीं जिस वजह से उन्होंने कुछ लोगों का दिल भी दुखाया, जोकि गलत था! पर हमेशा इंसान गलत नहीं होता है हालात उसे गलत सोचने पर मजबूर कर देते हैं कुछ ऐसा ही उनके साथ हुआ वो अब हद से अधिक नकारात्मक हो चुकी थीं! जो सबको नजर आ रहा था पर उसके पीछे का कारण किसी को नजर नहीं आ रहा था! जिस बात से वह हमेशा डरती रहती थी, एक फोन मिलाने के लिए वो रातों में भटकती रहती थी दूसरों के घर बेधड़क पहुँच जाती थी यह जानने के लिए कि कहीं शराब के नशे में कोई अनहोनी तो नहीं हो गई? उनके पति सही सलामत है कि नहीं? और ऐसे ख्याल उन्हें हमेशा डराते रहते थे पर कोई उनके दर्द को कभी नहीं समझ सका! लोग बोलते की हमेशा बुरा ही सोचती हो कभी अच्छा भी सोच लिया करो! जिस बात से वो हमेशा डरती रहतीं थीं ,शायद नियति को भी वही करना था! सन 2015 दीपावली से 5-6 दिन पहले की बात है  3:00 से 4:00 के मध्य उनके पति उन्हें ढूढ़ते हुए खेत की ओर गए जहाँ वो शायद लहसुन लगा रही थी! बोले बाजार जा रहा हूंँ अभी थोड़ी देर में आ जाऊंगा! इस पर वो बोली ठीक है पर जल्दी आ जाना कोहरे पड़ने लगे हैं रात मत करना! तो उन्होंने कहा अरे यार! घर के बगल में ही दावत है देर क्यों करूंगा जल्दी आ जाऊंगा दावत पर भी तो जाना है! इतना कहकर वो वहां से चले गए और वो वहीं काम करती रहीं! रात करीब 7:00 बजे थे कि अचानक बाहर से चाचा जी चिल्लाते हुए आए और बोले चाबी दो.....कहाँ है बाइक की चाभी.......चाभी दो चाभी जल्दी... ! सभी लोग पूछने लगे हुआ क्या है? लड़खड़ाती हुई आवाज में बोले मास्टर भैया का एक्सीडेंट.........! यह बात सुनकर सब घबरा जरूर गए पर कोई ज्यादा डरा नहीं क्योंकि सब को लगा कि जैसे पहले कई बार एक्सीडेंट हुआ था तो हल्की-फुल्की चोट लगी थी वैसे ही......! लेकिन कुछ ही मिनट में सैकड़ों लोग इकट्ठा होने लगे और सब रोने चिल्लाने लगे! सभी लोग उनके बीवी और बच्चे को समझा रहे थे और दिलासा दे रहे थे! और उनका बड़ा बेटा(10)बोल रहा था पापा को बस थोड़ी सी चोट आई है पिछली बार की तरह! अभी ठीक हो कर आ जाएंगे ये कह कर वो अपनी मां को चुप कराने का प्रयास कर रहा था! पर उन पर किसी बात का कोई असर नहीं हो रहा था एक्सीडेंट की बात सुनकर वह कुछ देर के लिए अपनी आवाज ही खो बैठी थीं! कुछ ही देर बाद सभी को पता चल गया कि एक्सीडेंट इतना भयानक था कि...... .! पर सभी लोग उनसे और उनके बच्चे से छुपा रहे थे हर कोई छुप-छुपकर बस रो रहा था! बहुत ही भयावह रात थी जिसकी सुबह और भी अधिक डरावनी थी! अब वह अचेत अवस्था में जा चुकी थी सुबह होने के बाद भी उनकी आंखों के सामने बस अंधेरा ही छाया हुआ था,हजारों लोग थे लेकिन फिर भी वह अकेली थी!  जिसकी आवाज इतनी तेज थी कि अगर वह पूरी ताकत से बोल दे तो किसी के कान के पर्दे फट जाए पर आज वही चिल्ला कर रो नहीं पा रही थी अपनी आवाज खो चुकी थी वह एक ऐसी रात जिसका कभी सवेरा ना हुआ जिसका अंधेरा आज भी उनकी जिंदगी में भरा हुआ है! आज 6 साल बाद उनके बच्चों की स्थिति एक अनाथालय के बच्चों से भी बदतर हो गई है खाने पीने की तो कमी नहीं है परवरिश मैं बहुत ही कमियाँ हैं! बड़े बेटे ने तो सभ्यता संस्कार और अच्छे व्यवहार जैसी चीज खत्म होती जा रही है वह अपनी मां की थोड़ी सी भी इज्जत नहीं करता है! इसमें उसकी पूरी गलती नहीं है क्योंकि बचपन से वह अपनी माँ की बेज्जती देखता आया है और आस-पड़ोस के लोगों के मुंह से सिर्फ बुराइयाँ ही सुनता आया है! इसलिए उसे लगता है कि उसकी मां सच में बहुत बुरी है उनमें थोड़ी भी अच्छाई नहीं है!  लोगों ने जितना बुरा बना दिया था उतनी बुरी थी नही!और उसकी छोटी बहन की हालत इतनी दयनीय है कि जिसे शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है उसके साथ बच्चे खेलना तक नहीं चाहते छोटे से लेकर बड़े सभी विषय देखकर नाक मुंह सिकुड़ना लगते हैं उसका व्यवहार सामान्य बच्चों सा है ही नहीं ना तो उसमें बचपना है और ना ही समझदारी पर लोग उसकी मदद करने की बजाय उसकी बुराइयाँ करते हैं और घृणा करते हैं! और कुछ आंखे तरेर कर भगा देते हैं! ये वही लोग होते हैं जो नवरात्री में कन्या खाने के लिए उसे बड़े प्यार से बुलाते हैं! मैं आये दिन देखतीं हूँ लोग भगवान के नाम पर लाखों खर्च कर देते हैं पर मदद के नाम पर एक दूसरे का मुंह देखने लगतें हैं! एक बार जब कुछ लोगों के यह कहने पर कि महीने में कम से कम एक बार सत्यनारायण जी की कथा जरूर सुननी चाहिए और ब्राह्मणों को भोजन खिलाना चाहिए, जब मैंने ये कहा कि इससे अधिक पुण्य तो उनके बच्चों की सिर्फ पढ़ाई का ही खर्चा उठा लो तो मिलेगा! तो बोलते हैं यहां खुद के  बच्चों का खर्चा उठा पाना मुश्किल है और ये दूसरों के बच्चों का खर्च उठाने की बात कर रहीं हैं! 
मैं ये नहीं कहती कि कोई पूजा पाठ नहीं करें, पर पूजा पाठ के जरिए जो लोग अपने पैसों का प्रदर्शन करते हैं वे जरूरतमंदों की मदद कर के करते तो अधिक बेहतर होता! इससे पैसों का प्रदर्शन भी हो जाता और किसी की मदद भी! 

24 टिप्‍पणियां:

  1. मैं आपके विचारों से सहमत हूँ। दूसरों की मुसीबत के वक़्त उनकी हर तरह से मदद करना और उन्हें जज़्बाती सहारा (मोरल सपोर्ट) देना ही सच्ची पूजा है। बाक़ी सब दिखावा है, अपने आपको दिया गया धोखा है। ऐसा बहुत लोगों के साथ (केवल महिलाओं ही नहीं, पुरुषों तथा इतर लिंगियों के साथ भी) होता है कि - इस रात की सुबह नहीं। ये केवल कहने की बातें हैं कि जिस तरह रात के बाद दिन ज़रूर आता है, उसी तरह दुख के बाद सुख ज़रूर आता है। हक़ीक़त अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग होती है। जिसके दुखों का अंत ही न हो, जिसकी ज़िन्दगी की काली रात का कोई सवेरा ही न हो; उसके लिए तो ये बातें खोखली ही हैं। मैं भी अपनी ज़िन्दगी के ज़्यादातर हिस्से में एक नास्तिक समान ही रहा हूँ। हो सकता है कि ईश्वर कहीं हो लेकिन अगर वह कमज़ोरों और मज़लूमों के साथ नहीं है, सच्चाई और इंसाफ़ का तरफ़दार नहीं है तो उसका होना क्या और न होना क्या? हम अपने आपको जितना अच्छा इंसान बना सकें, बनाएं; अपने भीतर की अच्छाई को जहाँ तक बचाकर रख सकें, बचाएं; यही काफ़ी है। दिखावटी पूजाओं और इबादतों से तो बेहतर ही है।

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    1. काश कि सभी लोग ऐसा सोचते तो आज यह स्थिति ना होती काश कि जितने पैसे भगवान के नाम पर खर्च करते हैं उसमें का कुछ हिस्सा जरूरतमंद लोगों की जरूरतें पूरे करने पर खर्च करते तो दृश्य कुछ और ही होता! बहुत कम लोगी ही हैं जो ऐसी सोच रखते हैं और उस पर कार्य करते हैं!

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(११-११-२०२१) को
    'अंतर्ध्वनि'(चर्चा अंक-४२४५)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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    1. मेरे लिए को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए आपका तहे दिल से धन्यवाद आदरणीय मैम 🙏

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  3. बहुत सुंदर लेख मनीषा जी, मैं आपके विचारों का समर्थन करता हूँ, आशा कर्ता हूं कि आपके इस लेख से प्रेरणा लेकर जरूर बहुत लोगों के जीवनशैली मे बदलाव आएगा

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  4. सुंदर लेख ।काश , ऐसा होता

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  5. मनीषा, तुम्हारी इस सत्यकथा ने हमारे समाज की लिंग-भेदी सोच पर सवाल उठाया है.
    मेरी दृष्टि में घुट-घुट कर अपमान और अत्याचार सहने वाली तुम्हारी नायिका प्रशंसा के योग्य नहीं है. उसे कहीं न कहीं दमन का, शोषण का, अपमान का, प्रतिकार तो करना ही चाहिए था.
    केंचुआ बन कर अगर कोई ज़िंदगी गुजारेगा तो लोगबाग तो उसे कुचलेंगे ही.
    आज के दौर में नारी को स्वयं-सिद्धा बनना होगा, दया की पात्र नहीं !

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    1. आप बिल्कुल सही कह रहें हैं पर हर किसी में इतनी हिम्मत नहीं होती और अगर ठोड़ी होती भी है तो अकेले पड़ जाने पर खत्म हो जाती है!पर ऐसा होना नहीं चाहिए! और अपने एकदम सही कहा कि-
      आज के दौर में नारी को स्वयं-सिद्धा बनना होगा, दया की पात्र नहीं !

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  6. सही कहा कुछ लोग ऐसे अभागे से मैंने भी देखे हैं पर इसकी असली वजह उन लोगों का सीधापन ही था ज्यादा सीधा और मीठा होने से भी दुनिया जीने नहीं देती।
    बहुत ही हृदयस्पर्शी संवेदनशील लेख।

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    1. आपने ठीक कहा सुधा जी। कई बार हम इसलिए अधिक दुख नहीं उठाते कि दूसरे बुरे हैं बल्कि इसलिए उठाते हैं कि हम बहुत भले हैं, सीधे-सच्चे हैं। पूर्णिमा के चंद्र को ही ग्रहण लगता है, वक्र चन्द्रमा को नहीं। बहुत अच्छा होना भी बुरा हो जाता है। सीधे वृक्ष पहले काटे जाते हैं और मीठे गन्ने को उसके रस के लिए कोल्हू में पेरा जाता है।

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  8. प्रिय मनीषा, एक अभागी नारी की मर्मकथा ने हृदय को वेदना सेविगलित सा कर दिया। ऐसे बहुत प्रसंगों से वाकिफ हूं। और दिनोदिन शिक्षा के प्रचार -प्रसार के साथ जिस दिखावटी धार्मिकता चलन समाज और परिवारों में बढ़ता जा रहा है वह चिंता और दुःख का विषय है। काश लोग समझ पाते ---- परहित सरिस धर्म नहीं भाई ----.

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    1. परहित सरिस धर्म नहीं भाई ----.
      आपने बिल्कुल सही कहा! 🙏🙏

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ये कलम हर बार कमाल करती है!

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