सोमवार, 12 जुलाई 2021

क्यों नहीं मिलती खुशी किसी को ईसानियत का फर्ज़ अदा कर?

कड़वा सत्य! 
कोई शांति के लिए भगवान को पूजता है , 
तो किसी को मिल जाती है खुशी, पत्थर पूज कर ! 
क्यों नहीं मिलती खुशी किसी को ईसानियत का फर्ज़ अदा कर?
भूखे बच्चों को नजरअंदाज करके , 
पत्थर की मूर्ति को छप्पन भोग लगाया जाता है,  
पत्थर की मूर्ति को सोने के पलने में सुलाया जाता है । 
और बे घर लोगों को फुटपाथ पर, 
खुले असामान के नीचे सोने के लिए छोड़ दिया जाता है!
पत्थर की मूर्ति के आगे दिन में भी घी के दीपक का प्रकाश है, 
पर झुग्गी - झोपड़ियों में आज भी अधियारे का राज है।
मंदिर मे करोड़ों दान कर दिया जाता है ,
पर एक गरीब से पैसे, 
सूत ब्याज सहित वापस ले लिया जाता है ! 
एक ढोंगी भगवा धारी को अतिथि कक्ष में ठहराया जाता है , 
वहीं एक बे सहारा को नौकर बना लिया जाता है।
इसिलिए तो आस्था के नाम पर हो रहा विश्वासघात है ! 
यहाँ पत्थर की नारी को सिर झुकाया जाता है , 
और जीवित नारी का प्रतिदिन चीरहरण किया जाता है! 
पत्थर की मूर्ति के खातिर इंसान,
इंसानियत का हत्यारा बन जाता है , 
मंदिर, मस्जिद, हिन्दू ,मुस्लिम के चक्कर में, 
इंसानियत का धर्म भूल जाता है ! 
मुझे आपत्ति नहीं किसी के पूजा और पाठ से ,
आपत्ति तो बस अंधविश्वास से । 
मानवता से बड़ कर मेरे लिए कोई धर्म नहीं ! 

17 टिप्‍पणियां:

  1. प्रिय मनीषा , आपकी रचना में एक आक्रोश है और आवेश है | सच है आज जिस तरह की पूजा और धर्म की जरूरत है वो है मानव धर्म | तुलसीदास जी ने भी कहा है --
    परहित सरस धर्म नहीं भाई ----|मंदिर - मस्जिद भी इस व्यवहार को अपनाएं तो कितने ही साधन विहीन सुखी हो जायेंगे और इनमें दिया जाने वाला चन्दा भी सार्थक हो जाएगा | यूँ ही लिखती रहो सीखती रहो | मेरी शुभकामनाएं और प्यार |

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    1. इतने दिनों बाद आज आप को अपने ब्लॉग पर देख कर कितनी खुसी हुई है शब्दों में बयां नही कर सकती ! आपका तहेदिल से धन्यवाद मैम, इतनी अच्छी टिप्पणी के लिए आपका बहुत बहुत आभार 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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    2. रेणु जी, मेरे जीवन का भी सूत्र-वाक्य एक ही है - परहित सरिस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई। इसी संदर्भ में मैंने 'मानवता का कलंक - सैडिज़्म अथवा परपीड़ानन्द' शीर्षक से लेख लिखा था।

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  2. मेरे लिए भी मानवता तथा उससे भी कहीं अधिक प्राणिमात्र के लिए संवेदनशीलता से बढ़कर कोई धर्म नहीं है मनीषा जी। सहमत हूँ आपके विचारों से।

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    1. काश कि सभी लोग आप की तरह होते! पता है सर बहुत से लोग तो मंदिरों और रामलीला, दुर्गा पूजा में अधिक चंदा इस लिए देते हैं कि सामने वाले ने एक हजार दिया तो वे दस हजार देते हैं ऐसी मुर्खता देख कर बहुत गुस्सा आता है सोचती हूँ काश ये लोग ऐसी प्रतिस्पर्धा जरूरतमंद की जरूरत को पूरा करने के लिए करते!

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  3. कड़वा है पर सत्य है। पर सच्चाई हर किसी के गले नहीं उतरती तभी तो इतनी अच्छी कविता पर सिर्फ दो ही लोगो ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। बाकियों ने तो अनदेखा कर दिया। चर्चा मंच मे शामिल करना तो बहुत दूर की बात। पर आप हमेशा ऐसे ही लिखती रहना किसी को पसंद आये या ना आये। वैसे भी आज कल लोग झूठ बोलने वाले को अधिक पसंद करते है। और इसे तो बिल्कुल भी नहीं कर सकते क्योंकि इसमे भगवान की पूजा ना करके मानवता को अपनाने की बात जो की गयी है मानवता को ईश्वर से भी ऊपर रखना हर किसी के बस की बात नहीं।

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    1. हा मैं हमेशा ऐसे ही लिखुंगी फिर चाहे कोई प्रतिक्रिया मिले या न मिल सब लोग इक बार देख ले और पढ़ ले मेरे लिए यही काफी है
      आपका बहुत बहुत धन्यवाद और आभार

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  4. आज समाज को इसी तरह अंधविश्वास और पाखंड से जागृत कर इंसानियत का पाठ सिखाने की जरूरत हैं । मैंने आपके सभी ब्लॉग पोस्ट को देखा । सभी में इस पोस्ट से ज्यादा प्रतिक्रिया है. लोग पढ़ते तो है पर सही-गलत की प्रतिक्रिया देना उचित नहीं समझते । लिखते रहिये, एक दिन सबकी आँख खुलेगी. आपसे मुझे हौसला मिला, मैं सोच-सोच कर रह जाता हूँ कि अंधविश्वास और पाखंड के खिलाफ लिखने पर कोई रिच नहीं मिलता पर जरूर लिखुगा.

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    1. आप बिल्कुल सही कह रहें हैं पर इस पोस्ट पर जोर प्रतिक्रिया मिली है वो बहुत ही अधिक शब्दों में की गई है और बाकियों में सिर्फ़ 10-12 शब्दों की है! वैसे भी मैं चाहतीं हूँ कि सब लोग मेरे पोस्ट को पढ़ लिया फिर चाहे प्रतिक्रिया दे या न दे ! आप हम से बहुत बड़े हो सर आप लोगो से हमें हौसला मिलता है कि कोई तो है जो ऐसी कविता पढ़ना पसंद करता है! आपका बहुत बहुत आभार और दिल की गहराइयों से धन्यवाद 🙏🙏🙏🙏

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  5. ये हुई बात.
    इसका जवाब न दे पाएंगे कुछ लोग.
    बस लगे रहो ये विचारधारा भी एक भगती है जो प्रकृति के करीब बहुत करीब ले जाएगी.
    इसी सोच को मजबूती मिलेगी जब आप पढोगे भगतसिंह की "मै नास्तिक क्यूँ हूँ ?"

    नई पोस्ट पौधे लगायें धरा बचाएं

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    1. धन्यवाद सर🙏🙏 मैने सरदार भगत सिंह की पुस्तक "मैं नास्तिक क्यों हूँ?" पढ़ी है बहुत ही अच्छी है जो अंधविश्वास को समाप्त कर इक नई विचार और नई चेतना जागृत करती !

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  6. यहाँ पत्थर की नारी को सिर झुकाया जाता है , 

    और जीवित नारी का प्रतिदिन चीरहरण किया जाता है! 

    कड़वा है पर सत्य है। 

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  7. यूँ तो तुम किस विषय में स्नातक कर रही हो, यह स्पष्ट नहीं है .. फिर भी सच कहूँ तो नास्तिक कोई भी नहीं होता। सभी आस्तिक ही होते हैं। बस .. कुछ, हम लोग प्रकृति (सागर, पहाड़, नदी, फूल-पौधे, पेड़-प्राणी) में ही एक अदृश्य शक्ति देखते हैं, और उसी की शक्ति का कुछ अंश हमारे शरीर में भी है .. शायद ...
    जिनको ये सब नज़र नहीं आता, पाखंड और आडम्बर की चश्मे से, वो पत्थरों और तीर्थ स्थलों में इसे तलाशते हैं। ये लोग खुद को आस्तिक कह कर अपनी गर्दनें अकड़ाते हैं।
    कोई गंगाजल लोटिया में भर कर आस्तिक कहलाता है, कोई नदी किनारे ही लहरों को आत्मसात कर आनन्दित हो कर नास्तिक कहलाता है। कोई फूलों की हत्या कर पत्थर पर बलि चढ़ा कर आस्तिक कहलाता है, कोई उसी फूल को डाली पर झूमता देखकर प्रफुल्लित हो कर, अपने प्रभु-दर्शन कर के नास्तिक कहलाता है .. शायद ...
    विडम्बना तो ये है कि इस तरह की विसंगतियाँ हमारे तथाकथित सभ्य समाज में कोने-कोने में व्याप्त है, चाहे वह स्वयं की दिनचर्या की बातें हों या क़ानून पालन का हो या फिर धर्म-आस्था की बात हो .. सब के सब को अपभ्रंश रूप में देखने के हम अभ्यस्त हो चुके हैं .. शायद ...
    ख़ैर ! .. अपनी तेवर को यूँ ही सँजोए रखना और इन वेव पन्नों के अलावा, हो सके तो जमीनी सतह पर भी, कम से कम एक इंसान को अपने इस तेवर के ताप से तपाने की कोशिश जरूर करना, पर जबरन नहीं, नहीं तो फिर तथाकथित "आस्तिकों" और "नास्तिकों" में फ़र्क ही क्या रह जाएगा भला ..

    (हम भी कोई विशेष ज्ञानी तो नहीं, फिर भी अपनी वर्तनी / Typoerror पर ध्यान दिया करो, पोस्ट करने के पहले एक-दो बार जाँच लिया करो .. मसलन- सूत व्याज = सूत ब्याज .. नहीं तो बुद्धिजीवी लोगबाग़ "स्वान्तः सुखाय" वाली श्रेणी में फ़ौरन चिपका देंगे .. प्रकृति हर पल तुम्हारे साथ सकारात्मक रहे .. बस यूँ ही ...).

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    1. सबसे पहले तो आपका तहेदिल से धन्यवाद इतने विस्तार समिक्षा के लिए🙏🙏🙏🙏
      सर मैं हर संभव प्रयास करती हूँ उस हर बात को जमीन पर करने का जिसका मैं अपने लेख या रचना में जिक्र करतीं हूँ यदि मैं कहती कुछ और हूँ, और करतीं कुछ और हूँ, तो मैं खुद की ही नज़रों में गिरने लगतीं हूँ ,उन लोगों से भी अधिक खुद को गिरा हुआ इंसान महसूस करने लगतीं हूँ ,जो सिर्फ़ अपने स्वार्थ के खातिर देवी-देवताओं को पूजते हैं ! इसी कारण मेरी अक्सर लोगों से बहस होती रहती है! सभी को लगता है कि मैं किसी की सुनती नहीं हूँ अपने आगे,क्योंकि मैं हमेशा निर्जीव वस्तुओं पर पैसा बर्बाद करने का विरोध करती हूँ! मैं अक्सर देखती हूँ कि लोग मंदिरों में करोड़ों दान कर देते हैं पर वही जब किसी गरीब को पैसे की जरूरत होती है तो उसकी मजबूरी का फायदा उठाने से नहीं चूकते हैं! मुझे आस्तिकों से कोई समस्या नहीं है पर जब भी भूखे को अनदेखा करके पत्थर को
      भोजन खिलाते हैं, तो बहुत ही गुस्सा आता है! और मुझे कदाचित बर्दास्त नही लोग कहते हैं कि ईश्वर सभी प्राणी ईश्वर के बच्चे हैं तो कोई भी माता-पिता कभी अपने बच्चों को भूखा छोड़ कर खुद की भूख मिटा ना स्वीकार करेंगे?और वैसे भी ईश्वर सभी का पालन पोषण करतें हैं तो फिर वो अपनी भूख तो मिटा ही लेते होगें! उन्हें छप्पन भोग लगाने की क्या जरूरत ?जब ईश्वर हर जगह उपस्थित हैं तो किसी एक स्थान को उनके नाम पर तीर्थ स्थल बनाने की क्या जरूरत? अगर ईश्वर में आस्था है तो बेशक पूरी श्रद्धा से उनकी अराधना करें पर धर्म के नाम पर हो रहें धंधे को बड़वा देना भक्ति नहीं है ये ढोंग है! और इससे ज्यादा कुछ नहीं! क्या घर पर सच्चे मन से ईश्वर की उपासना करने से ईश्वर खुश नहीं होते? सिर्फ़ बड़े बड़े तीर्थ स्थल पर जाने और बड़े बड़े भंडारा करने से ही खुश होते हैं? जितने पैसे भंडारे में खर्च कर दिया जाता है, उतने से किसी के सिर को छत मिल सकती है और किसी गरीब के सपनों को पंख लग सकतें है ,किसी गरीब के बेटी के हाथ पीले हो सकते हैं! जितना ईश्वर पर खर्च करते हैं उतने में बहुत लोगों बहुत कुछ हो सकता है!
      मुझे ईश्वर विश्वास नहीं है ये सच है, लेकिन जब था तब भी मैं लोगों की मदद करना ईश्वर की अराधना करने से ज्यादा पूण्य का काम मानती थी!
      वैसे मैं विज्ञान( जीवन विज्ञान) से स्नातक कर रहीं हूँ!
      मेरी गलती बताने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद सर🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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